गोरखपुर की 269 लड़कियों को अगवा कर UP से बाहर ले गए किडनैपर*

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*रुपये खर्च होने के डर से छुड़ाने नहीं जा रहे पुलिस वाले*

*गोरखपुर;* यूपी पुलिस को लड़कियों की बरामदगी में अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है। आलम यह है कि जो दरोगा ईमानदार हैं वे इस तरह के केस से पीछा छुड़ाने के लिए लाइनहाजिर हो जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। गोरखपुर जोन में वर्तमान में 269 लड़कियों को बहला-फुसला कर अपहर्ता यूपी से बाहर ले गए हैं। पुलिस को उनके ठिकानों की जानकारी तो है लेकिन उन्हें पकड़कर ले आने में आने वाले खर्च से डर कर पुलिसवाले सिर्फ समय पास कर रहे हैं। जिस मामले में वादी अपने स्तर से पुलिस की मदद (खर्च) को तैयार है उसमें लड़कियां जल्द बरामद कर ली जा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यशैली पर गोरखपुर के जिस मामले में पिछले दिनों टिप्पणी की थी उसमें भी कमोबेश यही कहानी थी। बेलीपार थाने की पुलिस और विवेचक को पता था कि अपहृत लड़की को लेकर अपहरणकर्ता कोलकाता में छिपा है पर गोरखपुर से कोलकाता तक जाने में आने वाले खर्च को लेकर विवेचक हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। पीआईएल के जरिये जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने यूपी की गोरखपुर पुलिस को अपनी जांच रिपोर्ट दिल्ली की मालवीय नगर थाने की पुलिस को सौंपने के लिए कहा तो उसके अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने लड़की को बरामद कर लिया। क्योंकि गोरखपुर पुलिस के विवेचक ने कोलकाता में उसके लोकेशन को दिल्ली पुलिस के साथ शेयर किया था।

फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वार यूपी पुलिस की कार्यशैली पर टिप्पणी करने और दिल्ली पुलिस की तारीफ करने पर अब यूपी से दूसरे प्रदेश गईं लड़कियों की बरामदगी सहित अन्य मामलों में दबिश को लेकर यूपी पुलिस की जेब से खर्च का हवाला देते हुए अलग बजट की बात उठने लगी है।

*269 लड़कियां अभी भी अपहर्ताओं के चंगुल में :* गोरखपुर जोन में वर्ष 2021 में 1124 लड़कियों को बहला-फुसला कर अपहरण किया गया। जबकि पिछले साल अपहृत हुई लड़कियों में 240 लड़कियां 31 दिसम्बर 2020 तक बरामद नहीं हो पाई थीं। इस हिसाब से कुल 1364 लड़कियों की जोन के 11 जिलों की पुलिस ने तलाश शुरू की थी। उसमें से 1100 लड़कियों को पुलिस ने 31 अगस्त 2021 तक बरामद कर लिया था। वहीं 269 लड़कियां अभी भी लापता हैं। इन सभी लड़कियों की लोकेशन यूपी से बाहर यानी दिल्ली, मुम्बई, कोलकता, बंगलुरु, बिहार सहित अन्य प्रदेश में मिल रही है। इन्हें बरामद करने में होने वाले खर्च का इंतजाम न होने से पुलिस वहां जाने से बच रही है और गोरखपुर से ही फोन कर हाजिर होने का दबाव बना रही है। फिलहाल अभी जो लड़कियां बरामद नहीं हो पाई हैं उसमें देवरिया की 51, गोंडा की 44, गोरखपुर की 34 और बहराइच की 33 हैं।

*यह होती है दिक्कत;*

लड़कियों को बरामद करने में और उनके अपहर्ताओं को पकड़ने में विवेचक के अलावा एक सिपाही और एक महिला सिपाही की टीम बननी पड़ती है। कभी-कभी अपहर्ता की संख्या एक से ज्यादा हुई तो सिपाहियों की संख्या बढ़ानी पड़ती है। दूसरे प्रदेश में दबिश में जाने वाली टीम को अगर जेब से हुए खर्च का पैसा चाहिए तो उन्हें ट्रेन या फिर बस से टिकट लेकर जाना होगा और उसी से फिर वापस आकर पूरे खर्च का बिल बाउचर के साथ हिसाब देना होगा। अब पुलिसकर्मी हर जगह बस या ट्रेन से व्यवहारिक रूप से जा नहीं सकते हैं ऐसे में उनके जेब से काफी पैसा खर्च होता है जो कि उन्हें कभी मिलता नहीं है।

*25 से 50 हजार तक आता है खर्च;*

गोरखपुर से मुम्बई ले जाई गई एक लड़की को बरामद करने में 25 से लेकर 50 हजार रुपये तक का खर्च हो जाता है। अब जिस लड़की के माता-पिता सक्षम हैं वे तो अपनी इज्जत बचाने और बेटी को जल्द बरामद करने के लिए पुलिस टीम के आने-जाने के लिए गाड़ी का इंतजाम करते हैं। लोकेशन ट्रेस होने के बाद जब टीम उसे बरामद करने के लिए जाती है तो पहली बार में अगर पकड़ लिया तो ठीक, नहीं तो फिर वहीं रुक कर अन्य ठिकानों की तलाश शुरू करने में ज्यादा पैसा खर्च होता है। अब जिन केसों के वादी आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं और वे बेटी को बरामद कराने में गाड़ी का इंतजाम कर नहीं पाते तो उसमें पुलिस की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती।
लड़कियों की बरामदगी में देरी में खर्च एक अहम वजह है। जो लड़कियां अभी तक नहीं बरामद हो पाई हैं उनमें ज्यादातर का लोकेशन दूसरे प्रदेश में मिल रहा है। उनकी बरामदगी और अपहर्ता को पकड़ने में विवेचक को अपनी टीम के साथ आने-जाने, खाने-पीने में हजारों रुपये तक खर्च होंगे।

सभी जिले के पुलिस कप्तानों से मैंने कहा है कि वह इसके लिए अलग से बजट का प्रबंध कर उनके लिए गाड़ी की व्यवस्था करें। दूसरे प्रदेश में दबिश के लिए जाने वाली टीम पर प्रत्येक जिले में एक अलग बजट के प्रावधान के लिए मुख्यालय को भी पत्र लिखा जाएगा।
*अखिल कुमार, एडीजी जोन*

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