भारत का यह एक ऐसा मंदिर.. जहाँ हर धर्म के लोग करते है पूजा..!

  • रामकोला धाम की पूरी कहानी, जानें क्या हैं मंदिर का इतिहास |
  • भागवत कथा से रामकोला को मिली पहचान, इस वजह से यह गांव पूरे देश में हुआ था प्रसिद्ध

रामकोला में एक रेलवे स्टेशन, दो चीनी मिलें (एक बन्द चल रही है), एक प्रसिद्ध मन्दिर तथा पुराना सब्जी बाजार है। रामकोला का इतिहास का बहुत ही पुराने समय से चला आ रहा है, रामकोला का गोविंद राव परिवार का पुराना इतिहास हैं, इस परिवार का बसाव रामकोला से 14 कोस की दूरी उत्तर तक फैला हुआ,यहां के श्री मदन गोविंद राव पूर्व विधायक हैं, चन्दन गोविंद राव एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने जनता इंटर कालेज रामकोला से माध्यमिक शिक्षा हासिल की ,फिर गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक,स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की,मेरठ विश्वविद्यालय से बीएड,एमड की डिग्री हासिल की,फैजाबाद विश्वविद्यालय से भी एक अन्य स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की,इग्नू विश्वविद्यालय से भी डिग्री हासिल किया है ,वर्धा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय से भी पत्रकारिता में स्नातक औऱ स्नातकोत्तर डिग्री हासिल किया है साथ ही अन्य कई बोर्ड से पढ़ाई किया है, ये एक कुशल नेतृत्वकर्ता, वक्ता, बुद्धिजीवी, शिक्षक हैं

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में एक रामकोला मंदिर है। रामकोला गांव से लेकर रामकोला धाम तक की कहानी बड़ी दिलचस्प है। सबसे प्रसिद्ध यहां की भागवत कथा रही, जो प्रदेश के लोगों के लिए रामकोला की पहचान बनी है। रामकोला देश का पहला गांव था, जहां गुलामी के दौर में दो चीनी मिलें लगी थीं। वहीं अनुसुइया मंदिर बनने के बाद रामकोला को रामकोला धाम के नाम से जाना जाने लगा।

ये है रामकोला की कहानी
जब देश गुलाम था, उस समय रामकोला गांव था। रामकोला को टाउन एरिया का दर्जा 1958 में मिला। बताया जाता है कि जब प्रदेश में जमींदारी प्रथा थी, उस समय रामकोला के जमींदारों की जमींदारी दूर तक थी। कुछ सौ वर्ष पहले यहां के जमींदारों ने एक बार रामकोला में भागवत कथा का आयोजन किया था। उसमें यहीं बगल के गांव मांडेराय के पुरोहित ने भागवत कथा शुरू की।

बताते हैं कि जब कथा शुरू हुई तो शुरुआत के समय कुछ लोग सुनने नहीं आ पाए थे। देर से पहुंचे लोगों ने फिर से भागवत कथा कहने के लिए पंडित से कहा। पंडित ने दोबारा कथा शुरू की। इसी प्रकार जो भी देर से आता था, वह कथा दोबारा शुरू से कहने के लिए बाध्य करता था। इस कारण आठ दिनों में समाप्त होने वाली भागवत कथा की महीनों बीत जाने के बाद भी केवल शुरुआत ही होती रही।

जमींदारों के इस रवैये से आजिज आकर पंडित भाग गए और जब उन्हें ढूंढा जाने लगा तो वे एक पेड़ पर चढ़कर कूद गए। इसी कारण उनकी मौत हो गई। उसके बाद यहां के जमींदारों ने उनके परिवार को दान में 700 एकड़ जमीन मांडेराय में दे दी। जहां अब भी उनकी बस्ती है। इस प्रकार रामकोला की भागवत कथा कभी समाप्त न होने वाली कथा हो गई।

एक गांव में बनी दो चीनी मिले
इसके बाद रामकोला गांव में 1930-31 में केदार नाथ खेतान ने खेतान चीनी मिल की स्थापना की। उसके एक साल बाद दी रामकोला शुगर मिल कंपनी के नाम की दूसरी चीनी मिल 1932 बाल मुकुंद शाह साहनी ने स्थापित की। उस समय यह देश का पहला गांव था, जहां एक गांव में दो चीनी मिलें लगी थीं। इन दो कार्यों की वजह से रामकोला की पहचान देश और प्रदेश में रही।

1992 में बकाए गन्ना मूल्य को लेकर किसान नेता राधेश्याम सिंह की अगुवाई में गन्ना आंदोलन शुरू किया गया। आंदोलन के तेइसवें दिन हुई फायरिंग के बाद राधेश्याम सिंह के साथ 75 किसानों पर मुकदमे दर्ज किए गए। इसके कारण इन लोगों को महीनों जेल में रहना पड़ा। रामकोला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। देश और प्रदेश के नेता रामकोला पहुंचने लगे। रामकोला गन्ना आंदोलन के लिए भी जाना जाने लगा।

वहीं रामकोला के ही निवासी एक व्यक्ति ने अनुसुइया जाकर अपनी तपस्या के दम पर इसी नाम पर मंदिर बनवाया। बाद में उन्हें परमहंस की उपाधि मिली। उन्हीं के शिष्यों ने रामकोला में अनुसुइया मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर की भव्यता देख यहां देश और प्रदेश के श्रद्धालु आने लगे। प्रत्येक वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन यहां भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसी के कारण रामकोला को रामकोला धाम के नाम से जाना जाने लगा।

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