ज्योतिषाचार्य पं. बृजेश पाण्डेय ने घर पर ही विधि विधान से किये श्रावणी उपाकर्म एवं सप्तऋषि पूजन

संवाददाता- बी.पी. मिश्र, गोरखपुर

गोरखपुर। आज दिनांक22 अगस्त दिन रविवार कोविद्वत जनकल्याण समिति द्वारा संचालित भारतीय विद्वत् महासंघ के महामंत्री व युवा जनकल्याण समिति के संस्थापक व संरक्षक ज्योतिषाचार्य पं. बृजेश पाण्डेय ने अपने आवास राजेंद्र नगर पश्चिमी गोकुलधाम मे विधि विधान पूर्वक श्रावणी उपाकर्म एवं सप्तऋषि पूजन किये. इस दौरान पं.बृजेश पाण्डेय ने श्रावणी उपाकर्म मे स्वयं मत्रोच्चार करते हुए पीली मिट्टी,भस्म,गाय का गोबर, काला तिल, अच्छत,फूल,कूशा,चिचिहिड़ा तथा पंचगब्य आदि एकत्रीत कर सर्वप्रथम आचमन कर पवित्री धारण करते हुए हाथ में अच्छत् फूल लेकर हेमाद्रि संकल्प किये तत्पश्चात पंचगब्य प्राशन किये एवं मिट्टी, गोबर, भस्म आदि से स्नान कर कूशा,चिचिहिड़ा से मार्जन किये तथा पुनः गायत्री मंत्र तथा सूर्य नमस्कार किये एवं तत्पश्चात देव तर्पण,ऋषि तर्पण,पितृ तर्पण,भीष्म तर्पण कर पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन कर कुश से सप्तऋषियों का स्वरुप निर्मित कर पूजा करते हुए पंचोपचार व षोड़शोपचार किये और फल,मिठा एवं वस्त्र आदि सप्तऋषियों को अर्पण किये एवं यज्ञोपवित की पूजा कर यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण किये. पं बृजेश पाण्डेय ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सोशल डिंस्टेंसिंग पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है, इसलिये गोरखनाथ मन्दिर भीम सरोवर पर सामूहिक रूप से कार्यक्रम ना करके विद्वानों के सुझाव से अपने-अपने घर पर ही लघु एवं बृहत रुप से सामर्थनुसार कार्यक्रम का आयोजन किया गया. श्रावणी उपाकर्म एवं सप्तर्षि पूजन करने से शरीर एवं आत्मा स्वच्छ तथा जाने अनजाने में किये गये पापों का शमन हो जाता है,श्रावणी उपाकर्म एवं सप्तर्षि पूजन करने से धन धान्य की प्राप्ति एवं सभी विकृतियां दूर हो जाती है. साथ ही अपने अपने घरों पर विभिन्न विद्वानों व युवाओं ने भी श्रावणी उपाकर्म व सप्तऋषि पूजन किये.

संस्कृत भाषा देव वाणी है: पं. बृजेश पाण्डेय

पं बृजेश पाण्डेय ने संस्कृत दिवस के बारे में भी बताते हुए कहे कि सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला संस्कृत दिवस अपने आप में अनूठा है। क्योकि इस प्रकार किसी अन्य प्राचीन भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर नहीं मनाया जाता है। इस दिन ऋषियो-मुनियों को याद किया जाता है। साथ ही उनका पूजन भी किया जाता है। मानते हैं कि संस्कृत साहित्य के मुख्य स्रोत यह ऋषि ही हैं। इसी मूल भाषा के कई अन्य भाषाओं का जन्म हुआ है।देव भाषा का दर्जा रखने वाली संस्कृत भाषा अब अपना वजूद खोती जा रही है। भारत में भी अब इसको पढ़ने, लिखने और समझने वालों की संख्या बहुत कम है। समाज को संस्कृत की महत्ता और आवश्यकता याद दिलाने के लिए संस्कृत दिवस मनाया जाता है। ताकि समय के आगे बढ़ने के साथ लोग यह भूल न जाएं कि संस्कृत भी एक भाषा है। आजकल लोग विदेशी भाषाओं को सीखने में रूचि रखते हैं। लेकिन स्वयं अपने देश की भाषा से अंजान हैं।संस्कृत केवल एक भाषा नहीं बल्कि एक संस्कृत्ति है जिसे संजोने की जरुरत है। इसलिए यह बहुत जरुरी है कि साल में एक दिन हर भारतीय को यह याद दिलाया जाए कि उसके अपने देश की भाषा कहीं पीछे छूटती जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *