“रूस से तेल खरीद जारी रहेगी” — अमेरिकी दबाव के बीच भारत का स्पष्ट संदेश, ऊर्जा नीति पर नहीं होगा समझौता
- अमेरिकी छूट खत्म होने के बाद भी भारत अडिग, कहा— ‘देशहित और ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि’
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक तेल राजनीति एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। इसी बीच भारत ने अमेरिका और पश्चिमी दबावों के बावजूद साफ संकेत दे दिए हैं कि रूस से कच्चे तेल की खरीद देश की ऊर्जा जरूरतों के आधार पर जारी रहेगी। अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट की अवधि 16-17 मई 2026 को समाप्त हो चुकी है, लेकिन भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका निर्णय किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों से तय होगा।
- भारत का दो टूक संदेश: “ऊर्जा जरूरतों के हिसाब से होगा फैसला”
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट शब्दों में कहा—
“अमेरिकी प्रतिबंध से मिली छूट आगे जारी रहती है या नहीं, इससे रूस से तेल खरीदने के हमारे फैसले पर कोई असर नहीं होगा। भारत अपने देश की ऊर्जा जरूरत के हिसाब से तेल खरीदता है।”
उन्होंने यह बयान पश्चिम एशिया संकट और भारत में पेट्रोलियम आपूर्ति की स्थिति पर चर्चा के दौरान दिया। हालांकि भारत पहले भी कई बार यह कह चुका है कि वह तेल खरीद को लेकर स्वतंत्र नीति अपनाता है, लेकिन किसी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी द्वारा इस तरह सार्वजनिक और स्पष्ट बयान दिए जाने को कूटनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
- रूस बना भारत का बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूस ने एशियाई देशों को रियायती दरों पर तेल की पेशकश शुरू की। भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए बड़े पैमाने पर रूसी कच्चे तेल की खरीद शुरू की। आंकड़ों के अनुसार—
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युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी केवल 0.02 प्रतिशत थी,
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लेकिन कुछ ही महीनों में यह बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई।
यह बदलाव वैश्विक ऊर्जा व्यापार में भारत की नई रणनीतिक स्थिति को दर्शाता है।
- अमेरिका का दबाव और भारत की संतुलित रणनीति
अमेरिका लगातार भारत समेत कई देशों पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बना रहा है। वॉशिंगटन का तर्क है कि रूस तेल निर्यात से होने वाली आय का इस्तेमाल युद्ध तैयारियों में कर रहा है। हालांकि भारत ने शुरू से यह रुख अपनाया कि वह किसी एक पक्ष के दबाव में अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करेगा। भारत का कहना है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल होने के नाते उसकी प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना है।
- ट्रंप प्रशासन की चेतावनी और भारत पर असर
2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने भारत सहित रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव और बढ़ा दिया था। अमेरिका की ओर से भारत पर 25 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ लगाने की चेतावनी भी दी गई थी। इस दबाव का कुछ असर भी दिखाई दिया, क्योंकि नवंबर-दिसंबर 2025 के दौरान भारत ने रूस से तेल खरीद में कुछ कमी की थी। लेकिन 2026 में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित होने लगी। इससे ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ गई।
- अमेरिका ने दी थी अस्थायी छूट
बढ़ते वैश्विक संकट और तेल आपूर्ति पर असर को देखते हुए अमेरिका ने मार्च 2026 में भारत को रूसी तेल खरीद पर लगे प्रतिबंधों से 30 दिनों की अस्थायी छूट दी थी। बाद में इसे बढ़ाकर 16 मई 2026 तक कर दिया गया। अब यह छूट समाप्त हो चुकी है, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि इससे उसकी खरीद नीति प्रभावित नहीं होगी।
- मार्को रूबियो के भारत दौरे पर टिकी नजरें
विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार अमेरिका से छूट अवधि बढ़ाने को लेकर बातचीत अभी जारी है। इसी कड़ी में इस सप्ताहांत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि भारत-अमेरिका वार्ता में ऊर्जा सुरक्षा, पश्चिम एशिया संकट, रूस-यूक्रेन युद्ध और तेल आपूर्ति का मुद्दा प्रमुख रूप से उठेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस मामले में संतुलित कूटनीतिक रणनीति अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।
- वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका
रूस से तेल खरीद को लेकर भारत का रुख यह संकेत देता है कि अब नई दिल्ली वैश्विक मंच पर अधिक आत्मविश्वास और रणनीतिक स्वतंत्रता के साथ फैसले ले रही है। भारत एक ओर अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रूस जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भी ऊर्जा और रक्षा सहयोग जारी रखना चाहता है। यही वजह है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत की भूमिका दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन बनाने वाले देश के रूप में उभर रही है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता के बीच भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों से संचालित होगी, न कि बाहरी दबावों से। अमेरिकी छूट समाप्त होने के बावजूद रूस से तेल खरीद जारी रखने का संकेत केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक स्वतंत्रता का भी बड़ा संदेश माना जा रहा है।







