विज्ञान कूटनीति की नई उड़ान! — एनआईएससीपीआर और आरआईएस के ऐतिहासिक समझौते से विज्ञान, नीति और नवाचार को मिलेगा वैश्विक विस्तार

विज्ञान कूटनीति की नई उड़ान! — एनआईएससीपीआर और आरआईएस के ऐतिहासिक समझौते से विज्ञान, नीति और नवाचार को मिलेगा वैश्विक विस्तार
  • भारत ने विज्ञान और कूटनीति के संगम से विकासशील देशों के लिए खोले सहयोग के नए द्वार

नई दिल्ली में 6 मई 2026 को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया, जब राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (एनआईएससीपीआर) और विकासशील देशों के लिए अनुसंधान एवं सूचना प्रणाली (आरआईएस) ने विज्ञान नीति और विज्ञान कूटनीति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

यह साझेदारी केवल दो संस्थानों के बीच औपचारिक समझौता नहीं, बल्कि विकासशील देशों के लिए विज्ञान आधारित समावेशी और सतत विकास की दिशा में एक मजबूत वैश्विक पहल के रूप में देखी जा रही है। इस सहयोग के माध्यम से संयुक्त अनुसंधान, नीति विश्लेषण, क्षमता निर्माण, पारंपरिक ज्ञान संरक्षण और विज्ञान संचार को नई गति मिलेगी। इस समझौते के अंतर्गत विज्ञान नीति, विज्ञान कूटनीति, पारंपरिक चिकित्सा, तकनीकी साझाकरण और जनसंपर्क गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त परियोजनाएं, कार्यशालाएं, नीति संवाद, शोध प्रकाशन और जन-जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत को विज्ञान कूटनीति के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

“विश्वास और सहयोग ही विज्ञान कूटनीति की असली शक्ति” — प्रो. सचिन कुमार शर्मा

आरआईएस के महानिदेशक प्रोफेसर सचिन कुमार शर्मा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और तकनीकी असमानताओं जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान केवल विज्ञान कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को वैज्ञानिक शासन और वैश्विक नीति निर्धारण में अपनी निर्णायक भूमिका निभानी होगी। प्रो. शर्मा ने आईटीईसी पाठ्यक्रम, आईजीओटी कर्मयोगी प्रशिक्षण, भारतीय विज्ञान कूटनीति मंच और दक्षिण-दक्षिण सहयोग से जुड़ी आरआईएस की अनेक पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत वैश्विक विज्ञान सहयोग का एक विश्वसनीय नेतृत्वकर्ता बनकर उभर रहा है।

“यह साझेदारी विकासशील देशों के लिए नई उम्मीद” — डॉ. गीता वाणी रायसम

सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने इस समझौते को “साझा विकास और पारस्परिक लाभ” का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान में एनआईएससीपीआर की विशेषज्ञता तथा आरआईएस की नीतिगत समझ मिलकर विज्ञान आधारित विकास मॉडल तैयार करेगी। उन्होंने सीएसआईआर की अनुसंधान एवं विकास प्रणाली, किफायती एचआईवी दवा नवाचार, ग्रामीण तकनीकी नवाचार, पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक सत्यापन और 15 ओपन-एक्सेस वैज्ञानिक पत्रिकाओं की उपलब्धियों को रेखांकित किया।

विज्ञान सहयोग से मजबूत होंगे विकासशील देश

आरआईएस के विज्ञान सलाहकार डॉ. एस.के. वार्ष्‍णेय ने कहा कि समानता, संप्रभुता और मांग-आधारित साझेदारी पर आधारित वैज्ञानिक सहयोग ही विकासशील देशों को आत्मनिर्भर बना सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रौद्योगिकी साझाकरण, स्वास्थ्य प्रणालियों की मजबूती और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करना आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वहीं आरआईएस के सहायक प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार ने इस साझेदारी को “नीतिगत विशेषज्ञता और वैज्ञानिक क्षमता का शक्तिशाली संगम” बताया।

पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान का होगा संगम

कार्यक्रम में डॉ. राजन सुधेश रत्ना ने विकासशील देशों में विज्ञान कूटनीति को विकास का प्रमुख प्रेरक बताया। सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. योगेश सुमन ने ग्रामीण आजीविका और सतत विकास के लिए सीएसआईआर तकनीकों के प्रसार में एनआईएससीपीआर की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। भारतीय पारंपरिक चिकित्सा मंच के समन्वयक डॉ. सारिन एनएस ने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और चिकित्सा भविष्य की वैश्विक साझेदारियों के मजबूत स्तंभ बन सकते हैं। इसके साथ ही डॉ. मोनिका जग्गी और डॉ. चारू लता ने विज्ञान कूटनीति और पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्र में एनआईएससीपीआर की पहलों को रेखांकित किया।

तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हुए जारी

इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग से जुड़े तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी जारी किए गए, जिनमें भारत-कोरिया विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग, भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने पर कार्यशाला की कार्यवाही और सड़क परिवहन से होने वाले कण प्रदूषण पर नीति बुलेटिन शामिल रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि ये दस्तावेज़ भारत की विज्ञान नीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। भारत-अफ्रीका विज्ञान सहयोग को मिलेगा नया आयाम

आरआईएस की सलाहकार डॉ. स्नेहा सिन्हा ने कहा कि विज्ञान कूटनीति पर पूर्व में हुए संयुक्त शोध और कार्यशालाओं ने भविष्य के सहयोग के लिए मजबूत आधार तैयार किया है। उन्होंने भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन से पहले विकासशील देशों के बीच विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

विज्ञान, नीति और कूटनीति का नया अध्याय

एनआईएससीपीआर और आरआईएस के बीच हुआ यह समझौता केवल संस्थागत सहयोग नहीं, बल्कि भारत की उस नई सोच का प्रतीक है जिसमें विज्ञान को समाज, नीति और वैश्विक कूटनीति से जोड़कर विकासशील देशों के लिए समावेशी भविष्य तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह साझेदारी आने वाले वर्षों में विज्ञान आधारित वैश्विक सहयोग, तकनीकी नवाचार और सतत विकास के क्षेत्र में भारत को एक नई पहचान दिला सकती है।