रील की सनक बनी जानलेवा: सिद्धार्थनगर की पानी की टंकी पर ‘फिल्मी’ हादसा, एक की मौत… 16 घंटे बाद हेलीकॉप्टर से बची दो ज़िंदगियाँ
आर.वी.9 न्यूज़ | संवाददाता, फ़िरोज अहमद, सिद्धार्थनगर, उ.प्र.
सिद्धार्थनगर | विशेष रिपोर्ट
सोशल मीडिया पर चंद सेकंड की चमक-दमक पाने की चाहत कब एक पूरी ‘त्रासदी की फिल्म’ बन जाए, इसका दर्दनाक उदाहरण सिद्धार्थनगर में देखने को मिला। मा० कांशीराम आवास कॉलोनी के पास स्थित एक जर्जर पानी की टंकी पर रील बनाने का शौक पाँच किशोरों पर इतना भारी पड़ा कि एक की जान चली गई, दो गंभीर रूप से घायल हो गए, और दो युवक घंटों तक मौत के साये में टंकी पर फंसे रहे।
रील का जुनून… और मौत का मंजर
शनिवार (02 मई) की दोपहर करीब ढाई से तीन बजे के बीच पाँच युवक पानी की टंकी पर चढ़ गए। बताया जा रहा है कि वे सोशल मीडिया के लिए रोमांचक रील बनाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन यह रोमांच कुछ ही पलों में भयावह हादसे में बदल गया। टंकी की जर्जर और कमजोर सीढ़ियां, जो पहले से ही बदहाल थीं, पाँचों का वजन सह नहीं सकीं। उतरते समय अचानक सीढ़ियां भरभरा कर गिर पड़ीं और तीन युवक सीधे नीचे आ गिरे।
परिणाम:
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एक किशोर की मौके पर ही दर्दनाक मौत
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दो युवक गंभीर रूप से घायल, अस्पताल में भर्ती
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दो युवक टंकी पर ही फंसे रह गए
16 घंटे का संघर्ष: ज़िंदगी और मौत के बीच जंग
टंकी के चारों ओर कीचड़, पानी और दलदल होने के कारण बचाव कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण बन गया। प्रशासन, पुलिस और राहत टीमें पूरी रात जुटी रहीं।
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जेसीबी से दलदली जमीन पर अस्थायी रास्ता बनाया गया
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सीढ़ियों वाली वैन को टंकी तक पहुंचाने की कोशिश हुई
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ड्रोन के जरिए फंसे युवकों तक भोजन पहुंचाया गया
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रातभर बारिश ने मुश्किलें और बढ़ा दीं
मौके पर जमा भीड़ के बीच एक अजीब विडंबना भी देखने को मिली—जहां कुछ लोग चिंतित थे, वहीं कई लोग इस दर्दनाक दृश्य की भी रील बनाने में व्यस्त रहे।
आख़िरकार ‘हीरो’ बना हेलीकॉप्टर
लगातार नाकाम कोशिशों के बाद रविवार (05 मई) की सुबह आसमान में सेना के हेलीकॉप्टर की गूंज सुनाई दी। यह दृश्य किसी फिल्मी क्लाइमैक्स से कम नहीं था।
रेस्क्यू ऑपरेशन:
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सेना के हेलीकॉप्टर ने टंकी पर फंसे दोनों युवकों को सुरक्षित निकाला
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करीब 16 घंटे बाद दोनों की जान बचाई जा सकी
भ्रष्टाचार की पोल भी खुली
घटना ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—टंकी की सीढ़ियां इतनी जर्जर क्यों थीं? स्थानीय लोगों का कहना है कि यह निर्माण कार्य में लापरवाही और भ्रष्टाचार का नतीजा है। टूटी हुई सीढ़ियां अब सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का प्रतीक बन चुकी हैं।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर चढ़े ही क्यों थे?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा और अनुत्तरित सवाल यही है— क्या कुछ सेकंड की रील के लिए अपनी जान जोखिम में डालना सही है? अगर यह हादसा सचमुच रील बनाने के चक्कर में हुआ है, तो यह पूरे समाज के लिए एक गहरी चेतावनी है।
समाज के नाम एक सख्त संदेश
आज के डिजिटल दौर में लाइक्स और व्यूज़ की दौड़ युवाओं को खतरनाक रास्तों पर ले जा रही है। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक आईना है—
- माता-पिता के लिए: बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें
- युवाओं के लिए: सोशल मीडिया की सनक को अपनी जिंदगी पर हावी न होने दें
- प्रशासन के लिए: जर्जर ढांचों की समय रहते जांच और मरम्मत सुनिश्चित करें
एक मासूम की मौत, कई सवाल छोड़ गई
यह घटना एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है, और समाज के लिए एक कड़वी सीख। “रील के चक्कर में बनी यह ‘पूरी फिल्म’… किसी भी कीमत पर दोबारा न दोहराई जाए।”







