एक मौत का दर्द बना दूसरी मौत की वजह — बांसगांव में दोहरी त्रासदी से उठा आक्रोश, न्याय की मांग तेज
आर.वी.9 न्यूज़ | ब्यूरो प्रमुख- एन. अंसारी
बांसगांव (गोरखपुर)।
शहर के बांसगांव वार्ड नंबर 9 से आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। पत्रकार और अधिवक्ता अग्निवेश सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का दर्द अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि उनके पिता सुनील सिंह ने भी इस सदमे और तनाव के बीच दम तोड़ दिया। इस दोहरी त्रासदी ने न केवल एक परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है, बल्कि पूरे इलाके में आक्रोश और सवालों की लहर भी पैदा कर दी है।
पहले बेटे की मौत, फिर पिता ने भी तोड़ा दम
बताया जा रहा है कि 27 फरवरी को कथित मारपीट की घटना के दौरान अग्निवेश सिंह की मौत हो गई थी। परिवार का आरोप है कि यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि गंभीर हिंसा का परिणाम था। इस मामले में पुलिस ने भले ही धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया, लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो सकी।
इस बीच, न्याय की उम्मीद और लगातार मिल रही धमकियों के बीच परिवार पर मानसिक दबाव बढ़ता गया। इसी तनाव के चलते अग्निवेश के पिता सुनील सिंह को अचानक सीने में दर्द हुआ। उन्हें गगहा के एक निजी चिकित्सक के पास ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर उठे सवाल
परिजनों का आरोप है कि शुरुआत में पुलिस ने मामले को हार्ट अटैक बताकर दबाने की कोशिश की। लेकिन जब वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई, तो उसमें शरीर पर 6 गंभीर चोटों का जिक्र था। इसके बावजूद मौत का स्पष्ट कारण न बताना कई सवाल खड़े कर रहा है।
धमकियों के साये में जी रहा था परिवार
परिवार का कहना है कि घटना के बाद से ही आरोपियों द्वारा लगातार धमकियां दी जा रही थीं। उन्होंने पुलिस प्रशासन से सुरक्षा की गुहार भी लगाई, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। इसी डर और तनाव ने परिवार की स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया।
सामाजिक रूप से सक्रिय थे सुनील सिंह
स्वर्गीय सुनील सिंह न केवल एक सम्मानित नागरिक थे, बल्कि वे बाल कल्याण समिति के सदस्य के रूप में समाज सेवा में भी सक्रिय भूमिका निभा चुके थे। उनके छोटे बेटे नीतीश सिंह दीवानी कचहरी में अधिवक्ता हैं, जिन पर अब पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई है।
जनता में उबाल, न्याय की मांग तेज
इस हृदयविदारक दोहरी घटना के बाद पूरे बांसगांव और आसपास के क्षेत्रों में भारी आक्रोश व्याप्त है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से जल्द से जल्द आरोपियों की गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
“अब नहीं तो कब?” — उठ रहा बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। आखिर कब तक पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए इस तरह तड़पना पड़ेगा?
बांसगांव की यह दोहरी त्रासदी केवल एक खबर नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक आईना है—जहां न्याय की देरी, पीड़ितों की पीड़ा को और गहरा कर देती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस आक्रोश को शांत करने के लिए कितनी जल्दी और कितनी निष्पक्ष कार्रवाई करता है।






