18 साल से पंचायत भवन बंद, इमारत बनी खंडहर, झोले में चलता है गांव का लेखा-जोखा
- वर्ष 2009 में लाखों की लागत से बना भवन भूमिधरी विवाद में फंसा, 2020 में मरम्मत पर खर्च के बाद भी नहीं शुरू हो सका संचालन

रानी की सराय (आजमगढ़)। ग्रामीणों की समस्याओं का स्थानीय स्तर पर समाधान कराने और ग्राम पंचायत के कामकाज को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के उद्देश्य से बनाए गए पंचायत भवन की कहानी सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। विकासखंड रानी की सराय के फरिहा गांव में वर्ष 2009 में बनकर तैयार हुआ पंचायत भवन करीब 18 वर्षों से उपयोग में नहीं आ सका है। निर्माण के समय भवन में दरवाजे, खिड़कियां, फर्श समेत अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। लेकिन निर्माण के बाद से ही भवन भूमिधरी विवाद में फंस गया। मामला न्यायालय तक पहुंचने के बाद पंचायत भवन का नियमित संचालन शुरू नहीं हो सका। वर्षों तक बंद पड़े रहने के कारण अब यह भवन देखरेख के अभाव में जर्जर होकर खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।
निर्माण से पहले जमीन की जांच पर उठे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत भवन के निर्माण से पहले यदि भूमि की स्थिति और स्वामित्व की समुचित जांच कर ली जाती तो भवन को विवाद में फंसने से बचाया जा सकता था। भवन तैयार होने के बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि पंचायत संबंधी कार्यों के लिए उन्हें गांव में ही सुविधा मिलेगी। लेकिन भूमिधरी विवाद के कारण यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी। न यहां अधिकारियों की नियमित बैठकें हो सकीं और न ही ग्राम पंचायत का कामकाज व्यवस्थित तरीके से संचालित हो पाया।
न्यायालय में मामला लंबित, वर्षों से बंद पड़ा भवन
ग्रामीणों के मुताबिक पंचायत भवन से जुड़ा मामला वर्षों से न्यायालय में लंबित है। न्यायिक विवाद के कारण भवन का उपयोग नहीं हो पा रहा है। लंबे समय तक बंद रहने और रखरखाव के अभाव में भवन की हालत लगातार खराब होती गई। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब भवन लंबे समय से विवादित था और उसका उपयोग भी नहीं हो रहा था, तब वर्ष 2020 में इसकी मरम्मत पर हजारों रुपये खर्च किए गए। ग्रामीणों का कहना है कि मरम्मत के बाद भी पंचायत भवन का संचालन शुरू नहीं हो सका। अब मरम्मत के कुछ वर्षों बाद ही भवन फिर जर्जर स्थिति में पहुंच गया है।
25 हजार की आबादी, फिर भी पंचायत भवन का लाभ नहीं
करीब 25 हजार की आबादी वाले फरिहा गांव में पंचायत भवन का उपयोग नहीं होने का सीधा असर ग्रामीणों पर पड़ रहा है। छोटी-बड़ी समस्याओं और पंचायत से जुड़े कार्यों के लिए लोगों को ब्लॉक और तहसील कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ग्रामीणों के अनुसार पंचायत से जुड़े दस्तावेज और जरूरी कामकाज आज भी दूसरे स्थानों पर करना पड़ता है। स्थिति इतनी असुविधाजनक है कि गांव का लेखा-जोखा तक झोले में लेकर चलना पड़ता है। जिस पंचायत भवन को ग्रामीणों को उनके गांव में ही सरकारी कामकाज की सुविधा उपलब्ध कराने का केंद्र बनना था, वही भवन वर्षों से बंद पड़ा है।
न विवाद का समाधान हुआ, न वैकल्पिक भवन मिला
ग्रामीणों का कहना है कि करीब 18 वर्षों से विवाद चल रहा है, लेकिन इसके स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी पहल नहीं हो सकी। न तो पुराने पंचायत भवन को विवाद से मुक्त कराकर उसका संचालन शुरू कराया गया और न ही ग्रामीणों की सुविधा के लिए कोई वैकल्पिक पंचायत भवन उपलब्ध कराया गया। अकबर, नन्नू, विनोद यादव, तबरेज, लाल बिहारी, धीरज, जेडी यादव और पंकज कुमार असिउ समेत अन्य ग्रामीणों का कहना है कि इतने लंबे समय तक भवन के अनुपयोगी पड़े रहने से सरकारी धन और संसाधनों का अपेक्षित लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल सका। ग्रामीणों की मांग है कि न्यायालय में लंबित मामले के समाधान के लिए नियमानुसार प्रभावी पहल की जाए और तब तक पंचायत के कामकाज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, ताकि लोगों को जरूरी कार्यों के लिए दूर-दराज के कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
वर्जन
“जिस गाटा संख्या में पंचायत भवन बना है, वह अब्दुल वली आदि के नाम दर्ज है। अब्दुल वली आदि ने उक्त गाटा संख्या को लेकर न्यायालय में मुकदमा दायर किया है। उनका दावा है कि पंचायत भवन उनकी भूमिधरी की जमीन में बना है। न्यायिक विवाद के कारण पंचायत भवन में ग्राम पंचायत स्तर का कार्य नहीं हो पा रहा है और मामला न्यायालय में लंबित है।”
— अजीत सिंह, ग्राम पंचायत अधिकारी
18 साल बाद भी समाधान का इंतजार
फरिहा गांव का यह पंचायत भवन केवल एक जर्जर इमारत की कहानी नहीं है, बल्कि लंबे समय से लंबित विवाद और उसके कारण प्रभावित हो रहे ग्रामीण पंचायत कार्यों का उदाहरण भी है। ग्रामीणों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब पंचायत भवन का विवाद खत्म होगा और कब गांव में पंचायत का कामकाज व्यवस्थित रूप से शुरू हो सकेगा?
लंबे समय से बंद पड़े भवन के कारण जहां ग्रामीणों को परेशानी उठानी पड़ रही है, वहीं सरकारी धन से निर्मित भवन भी उपयोग के अभाव में लगातार खराब होता जा रहा है। अब ग्रामीणों को स्थायी समाधान और पंचायत कार्यों के लिए सुचारु व्यवस्था का इंतजार है।
नोट: आपके मूल विवरण में “वर्ष 2009” और “करीब 18 साल” का उल्लेख है। वर्तमान वर्ष 2026 मानें तो 2009 से लगभग 17 वर्ष होते हैं; इसलिए प्रकाशित खबर में “करीब 18 साल” को बरकरार रखते हुए इसे स्थानीय रिकॉर्ड/प्रकाशन तिथि के अनुसार एक बार सत्यापित कर लेना बेहतर होगा।







