भ्रष्टाचार और दलाली का गठजोड़: जब अधिकारों पर भारी पड़ने लगे ‘सिफारिश’ और ‘सेटिंग’
भ्रष्टाचार कोई अकेला अपराध नहीं है। यह अक्सर एक ऐसे संगठित तंत्र का हिस्सा बन जाता है, जिसमें रिश्वत लेने वाला, रिश्वत देने वाला, बीच में सौदेबाजी करने वाला और सब कुछ देखकर भी चुप रहने वाला तंत्र—सभी की भूमिका पर सवाल उठते हैं। कहने को सरकारी कार्यालय जनता की सुविधा और सेवा के लिए बनाए गए हैं, लेकिन जब किसी नागरिक को अपना वैध और अधिकारपूर्ण काम कराने के लिए किसी बिचौलिए की तलाश करनी पड़े, तब व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
जहां फाइलों से पहले ‘फीस’ की चर्चा हो...
कुछ स्थानों पर आम नागरिकों की शिकायत रहती है कि काम नियम और प्रक्रिया के आधार पर कम तथा कथित तौर पर पहचान, पहुंच और सिफारिश के आधार पर अधिक आगे बढ़ता है। काम वही होता है, जो नियमानुसार होना चाहिए, लेकिन आम आदमी के सामने कई बार दो रास्तों की तस्वीर खड़ी कर दी जाती है—
पहला रास्ता: आवेदन करो, प्रक्रिया पूरी करो और इंतजार करो।
दूसरा रास्ता: किसी “सही आदमी” को खोजो, सिफारिश लगवाओ और कथित तौर पर काम जल्दी कराने की कोशिश करो। यहीं से शुरू होता है उस अदृश्य दलाली तंत्र का खेल, जिसकी कोई आधिकारिक पहचान नहीं होती, लेकिन जिसकी मौजूदगी की चर्चा अक्सर सरकारी दफ्तरों के गलियारों में सुनाई देती है।
‘काम करवाने और काम रुकवाने’ का अदृश्य तंत्र!
दलालों के पास न कोई सरकारी नियुक्ति पत्र होता है, न कोई संवैधानिक पद और न ही जनता के प्रति कोई प्रत्यक्ष जवाबदेही। इसके बावजूद कई जगहों पर उनकी कथित पहुंच इतनी प्रभावशाली बताई जाती है कि आम नागरिक सरकारी कार्यालय में जाने से पहले ऐसे लोगों की तलाश करने लगता है। कोई कहता है—
“उनसे मिल लो, काम जल्दी हो जाएगा।”
कोई दावा करता है—
“उनकी ऊपर तक पहुंच है।”
तो कोई कथित तौर पर यह भरोसा दिलाता है—
“आप परेशान मत होइए, आपका काम हो जाएगा।”
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई काम कानूनी और नियमानुसार है, तो उसे कराने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए?
भ्रष्टाचार और दलाली—एक ही सिक्के के दो पहलू?
भ्रष्टाचार कहता है—
“बिना लिए काम नहीं होगा।”
कथित दलाल कहता है—
“चिंता मत कीजिए, मैं काम करा दूंगा।”
और इनके बीच फंसा आम नागरिक सोचता रह जाता है कि आखिर वह सरकारी कार्यालय में आया है या किसी कमीशन एजेंसी के चक्कर में पड़ गया है। असल समस्या केवल रिश्वत लेने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकती। यदि किसी व्यवस्था में अवैध लेन-देन का आरोप सामने आता है तो यह जांचना भी आवश्यक है कि उस व्यवस्था तक पहुंचने का माध्यम कौन बना।
किसने संपर्क कराया?
किसने सौदेबाजी की?
किसके नाम का प्रभाव दिखाया गया?
और किसकी कथित शह या संरक्षण में यह पूरा तंत्र संचालित हुआ?
दलाली सिर्फ पैसों का खेल नहीं
दलाली का अर्थ केवल नोटों का लेन-देन नहीं है। कई बार यह पहचान के माध्यम से होती है, कभी राजनीतिक या सामाजिक पहुंच के नाम पर, कभी अधिकारियों से करीबी संबंधों के दावों के आधार पर और कभी दबाव के जरिए। यही कारण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को केवल रिश्वत लेने या देने के आरोप तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यदि किसी भ्रष्ट व्यवस्था की जड़ तक पहुंचना है तो उस पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी है, जो कथित तौर पर—
दलाल से अधिकारी,
अधिकारी से व्यवस्था और
व्यवस्था से संरक्षण तक पहुंचती है।
जनता को अधिकार चाहिए, दलाल नहीं
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत आम नागरिक है। जनता किसी पर एहसान नहीं मांगती, बल्कि अपने अधिकारों के अनुसार मिलने वाली सेवाओं की अपेक्षा करती है।सरकारी व्यवस्था में जरूरत है—
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पारदर्शी प्रक्रिया की
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समयबद्ध सेवाओं की
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ऑनलाइन और जवाबदेह व्यवस्था की
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शिकायतों के प्रभावी निस्तारण की
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और बिचौलियों से मुक्त कार्यालयों की
जब तक आम आदमी को यह भरोसा नहीं होगा कि उसका काम बिना सिफारिश और बिना किसी कथित अवैध भुगतान के भी समय पर हो सकता है, तब तक व्यवस्था के प्रति विश्वास पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाएगा।
सिर्फ लेने वाला नहीं, रास्ता बनाने वाला भी सवालों के घेरे में हो
भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप की निष्पक्ष जांच में केवल उस व्यक्ति तक पहुंचना पर्याप्त नहीं होना चाहिए, जिस पर सीधे तौर पर पैसे लेने का आरोप है। जांच का दायरा उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए, जो कथित तौर पर इस पूरे लेन-देन के माध्यम, सूत्रधार या सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। क्योंकि भ्रष्टाचार का पेड़ केवल रिश्वत लेने वाले से नहीं बढ़ता।
उसे पानी देने वाले बिचौलिए,
उसे संरक्षण देने वाली चुप्पी
और उसे नजरअंदाज करने वाली व्यवस्था भी उतनी ही जिम्मेदार हो सकती है।
अब उठना चाहिए सबसे बड़ा सवाल
सरकारी कार्यालयों के बाहर और भीतर यदि कोई अनौपचारिक ‘दलाली तंत्र’ सक्रिय होने के आरोप लगते हैं, तो उस पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठने चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल इतना नहीं है कि—
“भ्रष्टाचार हुआ या नहीं?”
बल्कि असली सवाल यह भी है कि—
“अगर भ्रष्टाचार हुआ, तो उस रास्ते का गाइड कौन था?”
जनता से सीधा सवाल
जब किसी नागरिक को अपने अधिकार का काम कराने के लिए ‘सिस्टम’ से ज्यादा ‘सिफारिश’ की जरूरत महसूस होने लगे, तो दोष केवल भ्रष्टाचार का है या उस भ्रष्टाचार को पनपने देने वाले पूरे दलाली तंत्र का?
आपकी राय क्या है?







