तीन महीने में 5,650 स्वयं सहायता समूहों का गठन, 94 हजार महिलाओं को जोड़ा गया—आजमगढ़ में ‘मातृ शक्ति’ से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था
- सोशल मोबिलाइजेशन अभियान में आजमगढ़ की बड़ी छलांग, 6,000 समूहों के गठन के साथ प्रदेश में तीसरे स्थान पर पहुंचा जनपद; समूह दीदियां बन रहीं आर्थिक सशक्तिकरण और उद्यमशीलता की नई पहचान

आजमगढ़। गांवों की चौपाल से लेकर बाजार तक और घर की चारदीवारी से निकलकर अब आजमगढ़ की महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी ‘समूह दीदियां’ अब केवल सरकारी योजनाओं की लाभार्थी नहीं रह गई हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाली सक्रिय उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता और बदलाव की नेतृत्वकर्ता बनकर उभर रही हैं।

महिला स्वावलंबन, आर्थिक सशक्तिकरण और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे अभियान को आजमगढ़ में मिशन मोड पर आगे बढ़ाया गया है। जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार के कुशल निर्देशन में परिवार संतृप्तिकरण एवं सोशल मोबिलाइजेशन अभियान के तहत महज तीन महीनों में स्वयं सहायता समूहों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अप्रैल 2026 तक जहां लगभग 350 समूहों से करीब 6,000 महिलाएं जुड़ी थीं, वहीं मई, जून और जुलाई 2026 के दौरान अभियान को गति मिलने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 6,000 समूह और 1 लाख महिलाओं तक पहुंच गया। यानी तीन महीने के भीतर करीब 5,650 नए समूहों का गठन हुआ और लगभग 94 हजार महिला सदस्य स्वयं सहायता समूहों से जुड़ीं। यह उपलब्धि आजमगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सहभागिता और आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में एक बड़ी छलांग मानी जा रही है।
सोशल मोबिलाइजेशन में आजमगढ़ प्रदेश में तीसरे स्थान पर
स्वयं सहायता समूहों के गठन और पात्र परिवारों को समूहों से जोड़ने के लिए जनपद में व्यापक स्तर पर अभियान चलाया गया। अधिकारियों और समूह सखियों को जिम्मेदारियां सौंपकर गांव-गांव तक पहुंच बनाई गई। जनपद की 1,810 ग्राम पंचायतों में प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए दो समूह सखी के हिसाब से कुल 3,620 समूह सखियों का चयन किया गया। हरिऔध कला केंद्र, आजमगढ़ में इन समूह सखियों का उन्मुखीकरण एवं प्रशिक्षण कराया गया। इसके बाद विकासखंड स्तर पर सहायक विकास अधिकारियों को नोडल अधिकारी नामित करते हुए समूह सखी, आईसीआरपी और अन्य कैडर के माध्यम से डोर-टू-डोर सोशल मोबिलाइजेशन अभियान चलाया गया। पात्र परिवारों को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के लाभ समझाए गए और महिलाओं को समूहों से जोड़ा गया। जिलाधिकारी द्वारा लगातार बैठकों, समीक्षा और स्थलीय निरीक्षण के माध्यम से अभियान की निगरानी की गई। इसके परिणामस्वरूप अब तक लगभग 6,000 समूहों का गठन किया गया है और सीएम डैशबोर्ड पर आजमगढ़ को इस अभियान में प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है।
आजमगढ़ में 25 हजार समूहों से जुड़ीं करीब तीन लाख महिलाएं
आजमगढ़ में महिला स्वयं सहायता समूहों का दायरा अब तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में लगभग 25 हजार स्वयं सहायता समूहों से करीब तीन लाख महिलाएं जुड़ी हुई हैं। इन समूहों की महिलाएं कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य, विद्युत, कैंटीन संचालन, जैविक खाद निर्माण, आपदा प्रबंधन और सामाजिक जागरूकता सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रही हैं। लाइवलीहुड ऑन व्हील्स, पिंक प्रेरणा कैंटीन, गो-धन संकल्प, वर्मी कम्पोस्ट, कृषि सखी, बैंक सखी, विद्युत सखी, स्वास्थ्य सखी, बीमा सखी, आपदा सखी और शक्ति सखी जैसी गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं को आय के नए अवसर मिल रहे हैं। इन प्रयासों का असर यह है कि जनपद में एक लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी बनने की दिशा में आगे बढ़ चुकी हैं।
‘समूह दीदियां’ अब सिर्फ लाभार्थी नहीं, विकास की भागीदार
जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार का कहना है कि स्वयं सहायता समूह केवल आर्थिक गतिविधियों का माध्यम नहीं हैं। इनके जरिए ग्रामीण महिलाओं को परिवार के आर्थिक निर्णयों में भागीदारी, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक बदलाव की जिम्मेदारी मिल रही है। उनके अनुसार, जब महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत होती हैं तो उसका सीधा प्रभाव पूरे परिवार और गांव की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यही कारण है कि प्रशासन का जोर महिलाओं को केवल योजनाओं से जोड़ने के बजाय उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार और उद्यम के अवसर उपलब्ध कराने पर है।
विभिन्न निधियों से समूहों को मिल रहा आर्थिक आधार
राष्ट्रीय एवं राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामीण निर्धन परिवारों की महिलाओं को संगठित कर उन्हें स्थायी संस्थाओं के माध्यम से आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। समूह गठन के बाद स्टार्टअप फंड के रूप में 2,500 रुपये समूह के खाते में उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बाद समूह गठन के तीन माह पश्चात रिवॉल्विंग फंड के रूप में 30 हजार रुपये उपलब्ध कराए जाते हैं। समूह गठन के छह माह बाद कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (सीआईएफ) के रूप में 1.50 लाख रुपये सीएलएफ एवं नोडल ग्राम संगठन के माध्यम से उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। कृषि आधारित आजीविका गतिविधियों के लिए ग्राम संगठनों को दो लाख रुपये तक का लाइवलीहुड फंड उपलब्ध कराया जाता है। वहीं प्राकृतिक आपदा, बीमारी, भुखमरी, मृत्यु अथवा अन्य जोखिम की परिस्थितियों में समूह सदस्यों को सहायता उपलब्ध कराने के लिए वल्नरेबिलिटी रिडक्शन फंड (वीआरएफ) की व्यवस्था की गई है।
बैंक क्रेडिट लिंकेज से बढ़ रहे छोटे कारोबार
स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक रूप से मजबूत करने में बैंक क्रेडिट लिंकेज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। समूह गठन के छह माह बाद प्रथम डोज के रूप में 1.50 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जाता है। समूहों के लिए स्वीकृत ऋण सीमा अधिकतम छह लाख रुपये तक बताई गई है। ब्याज अनुदान के माध्यम से पात्र समूहों को निर्धारित शर्तों के अनुसार ऋण सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। समय से ऋण की अदायगी करने पर अतिरिक्त ब्याज छूट का भी प्रावधान है। इस वित्तीय सहायता के जरिए महिलाएं छोटे व्यवसाय, कृषि आधारित गतिविधियां, खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, सिलाई-कढ़ाई और स्थानीय उद्यम शुरू कर अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं।
250 पिंक प्रेरणा दीदी कैंटीन बनी महिला उद्यमिता की पहचान
महिला उद्यमिता को स्थानीय बाजार से जोड़ने के लिए आजमगढ़ में 250 पिंक प्रेरणा दीदी कैंटीन/फास्ट फूड सेंटर शुरू किए गए हैं। ‘लाइवलीहुड ऑन व्हील्स’ के माध्यम से स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को अनुदान के जरिए आधुनिक ठेले उपलब्ध कराए गए हैं। इसका उद्देश्य महिलाओं को स्वरोजगार के लिए तैयार करना और उन्हें स्थानीय बाजार में अपना व्यवसाय स्थापित करने का अवसर देना है। जिलाधिकारी के अनुसार, यह पहल महिलाओं को मुख्यधारा के व्यवसाय से जोड़ने और उनकी आय बढ़ाने की दिशा में अभिनव प्रयोग है। पिंक प्रेरणा दीदी कैंटीन जहां महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बन रही हैं, वहीं स्थानीय लोगों को गुणवत्तापूर्ण खाद्य सेवाएं भी उपलब्ध करा रही हैं।
गो-धन संकल्प से गोबर बना कमाई का जरिया
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की दिशा में ‘गो-धन संकल्प अभियान’ भी महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में पंचायती राज, राजस्व एवं विकास विभागों को कुल 27,13,713 पौधरोपण का लक्ष्य मिला। प्रत्येक पौधे के लिए एक किलोग्राम की दर से 27,13,713 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट तैयार कराया गया। इसका उत्पादन और आपूर्ति स्वयं सहायता समूहों द्वारा की गई। स्थायी और अस्थायी गौशालाओं को स्वयं सहायता समूहों से मैप कर गोबर को 50 पैसे प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा गया और उससे वर्मी कम्पोस्ट तैयार कराया गया। समूहों द्वारा तैयार वर्मी कम्पोस्ट को 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कराया गया तथा भुगतान सीधे समूहों के खाते में किया गया। इससे स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को लगभग 2 करोड़ 71 लाख रुपये की अतिरिक्त आय का लक्ष्य रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक करीब 1 करोड़ 12 लाख रुपये का भुगतान हो चुका है। वहीं गौशालाओं को भी लगभग 12.30 लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हुई है। यह पहल महिला आय, गौशाला प्रबंधन, जैविक खेती और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का उदाहरण बन रही है।
बाढ़ के समय गांवों की ‘आपदा सखी’ बनेंगी सुरक्षा की ढाल
मानसून और संभावित बाढ़ की परिस्थितियों को देखते हुए आजमगढ़ में आपदा सखियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनाई गई है। हरैया, महाराजगंज और अजमतगढ़ विकासखंडों में तैनात 60 आपदा सखियां गांव-गांव जाकर लोगों को आपदा प्रबंधन और बचाव के उपायों की जानकारी दे रही हैं। इन प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा बाढ़ के समय सुरक्षित स्थानों पर जाने, राहत शिविरों, प्राथमिक उपचार, आपातकालीन संपर्क नंबरों तथा बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा के संबंध में ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है। जलभराव, विद्युत दुर्घटनाओं और दूषित पानी से होने वाली बीमारियों के प्रति भी लोगों को सावधान किया जा रहा है।
हर घर तिरंगा में समूह दीदियों ने तैयार किए 3.5 लाख तिरंगे
देशभक्ति के अभियान में भी आजमगढ़ की समूह दीदियों की भागीदारी देखने को मिली। ‘हर घर तिरंगा अभियान 2026’ के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन से जुड़ी महिलाओं ने करीब 3.5 लाख तिरंगे झंडे तैयार किए। प्रति झंडा 20 रुपये की दर से समूहों को कुल 70 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इस तरह राष्ट्रीय ध्वज निर्माण के जरिए महिलाओं को एक ओर राष्ट्रसेवा और देशभक्ति से जुड़ने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का जरिया भी तैयार हुआ। समूह की महिलाओं के लिए तिरंगा तैयार करना केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्मान और सहभागिता का गौरवपूर्ण अवसर भी रहा।
राखी निर्माण से बाजार में दिखेगी समूह दीदियों की हुनरकारी
रक्षाबंधन को ध्यान में रखते हुए स्वयं सहायता समूह की महिलाएं विभिन्न रंगों और डिजाइनों की आकर्षक राखियां भी तैयार कर रही हैं। इन राखियों में रंग-बिरंगे धागों, मोतियों और सजावटी सामग्री का प्रयोग किया जा रहा है। प्रशिक्षण प्राप्त महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को स्थानीय बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। डीसी एनआरएलएम डॉ. आराधना त्रिपाठी के अनुसार, स्थानीय स्तर पर तैयार राखियों की बिक्री से महिलाओं को अपने उत्पाद की पहचान बनाने और बाजार से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा।
समूह की महिलाओं को पात्र गृहस्थी योजना से जोड़ने की पहल
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के साथ-साथ उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने पर भी प्रशासन का जोर है। जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार की पहल पर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को पात्र गृहस्थी योजना से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में आजमगढ़ में लगभग पांच लाख महिलाओं को समूहों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए जिले में 30,218 स्वयं सहायता समूहों के गठन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अभियान में पात्र गृहस्थी और अंत्योदय परिवारों की महिलाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। वित्तीय वर्ष के शुरुआती चार महीनों में अब तक 4,256 स्वयं सहायता समूहों का गठन हो चुका है और इनमें 75 हजार से अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं।
शक्ति सखी—अब गांव की महिलाओं की आवाज भी
महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक नेतृत्व की भूमिका में आगे बढ़ाने के लिए स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को ‘शक्ति सखी’ के रूप में नई जिम्मेदारी दी गई है। शक्ति सखियां महिलाओं की समस्याएं सुनती हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी देती हैं और संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर समस्याओं के समाधान में मदद करती हैं। चयनित शक्ति सखियों को प्रति माह 6,000 रुपये मानदेय और 1,500 रुपये यात्रा भत्ता दिए जाने की व्यवस्था है। इससे ग्रामीण महिलाओं के बीच सामाजिक नेतृत्व की एक नई भूमिका विकसित हो रही है।
‘मातृ शक्ति से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आएगा बहुत बड़ा बदलाव’
जिलाधिकारी रविन्द्र कुमार ने कहा कि स्वयं सहायता समूह की दीदियां अब केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि विकास की सक्रिय भागीदार और परिवर्तन की नेतृत्वकर्ता बन रही हैं। उन्होंने कहा कि कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, कैंटीन संचालन, वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन, बैंकिंग, बीमा, विद्युत, स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और सामाजिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही है।
“मातृ शक्ति के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।”
उनका कहना है कि प्रशासन का लक्ष्य पात्र परिवारों की महिलाओं को शत-प्रतिशत स्वयं सहायता समूहों से जोड़ना और उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार तथा उद्यम के अवसर उपलब्ध कराकर आत्मनिर्भर बनाना है।
आजमगढ़ की बेटियां और बहुएं लिख रहीं आत्मनिर्भरता की नई इबारत
आजमगढ़ में स्वयं सहायता समूहों का बढ़ता विस्तार केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन हजारों महिलाओं की बदलती जिंदगी की कहानी है, जो कभी घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं और आज कारोबार, बैंकिंग, कृषि, खाद्य उत्पादन, सामाजिक सेवा और आपदा प्रबंधन तक अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
5,650 नए समूह, 94 हजार नई महिला सदस्य, करीब तीन लाख महिलाओं का व्यापक नेटवर्क और एक लाख से अधिक लखपति दीदियों का आंकड़ा ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की दिशा में आजमगढ़ की बदलती तस्वीर को सामने रखता है। आने वाले समय में यदि प्रशिक्षण, बाजार और वित्तीय संसाधनों से इन समूहों को निरंतर मजबूत किया गया, तो यही समूह दीदियां गांवों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकती हैं। आजमगढ़ में चल रहा यह अभियान इस संदेश को मजबूती देता है कि जब गांव की महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत होती हैं, तो केवल एक परिवार नहीं, बल्कि पूरा गांव और पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।







