सरकारी साइबर फॉरेंसिक अफसर बनकर व्यापारी को लगाया करोड़ों का चूना, 11 महीने में ठगे 1.29 करोड़ रुपये

गुजरात के सूरत में खुद को सरकारी साइबर फॉरेंसिक अधिकारी बताकर पेट्रोकेमिकल व्यापारी और उसके परिचितों से 1 करोड़ 29 लाख 25 हजार 100 रुपये की ठगी का मामला सामने आया है। आरोपी प्रियंक व्यास पर फर्जी सरकारी आईडी, सरकारी बोर्ड लगी कार और करोड़ों के बैंक बैलेंस का दिखावा कर IP सर्वर, फॉरेंसिक टेस्टिंग और बिटकॉइन रिकवरी के नाम पर करीब 11 महीने तक रकम वसूलने का आरोप है।

सरकारी साइबर फॉरेंसिक अफसर बनकर व्यापारी को लगाया करोड़ों का चूना, 11 महीने में ठगे 1.29 करोड़ रुपये
  • फर्जी सरकारी आईडी कार्ड, राजचिह्न और सरकारी बोर्ड लगी कार से जमाया रौब; क्रिप्टोकरेंसी, बिटकॉइन रिकवरी और फॉरेंसिक टेस्टिंग के नाम पर करता रहा वसूली, साइबर क्राइम सेल के सामने आया बड़ा मामला


सूरत (गुजरात)। साइबर अपराध की दुनिया में ठग अब केवल फोन कॉल, फर्जी लिंक और ओटीपी के जरिए ही लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि सरकारी अधिकारियों का रूप धारण कर विश्वास जीतने और करोड़ों रुपये की ठगी करने के नए तरीके भी अपना रहे हैं। गुजरात के सूरत शहर में साइबर ठगी का ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक कथित साइबर फॉरेंसिक अधिकारी ने पेट्रोकेमिकल व्यापारी और उसके परिचितों को करोड़ों रुपये का फंड दिलाने तथा क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी रकम वापस कराने का झांसा देकर करीब 11 महीने में 1 करोड़ 29 लाख 25 हजार 100 रुपये वसूल लिए।

आरोपी की पहचान प्रियंक समीरभाई व्यास के रूप में बताई गई है। आरोप है कि उसने खुद को सरकारी साइबर फॉरेंसिक विभाग का अधिकारी और 'फॉरेंसिक साइबर क्राइम स्पेशलिस्ट' बताकर पीड़ितों के सामने अपनी प्रभावशाली छवि बनाई। विश्वास हासिल करने के लिए उसने फर्जी सरकारी पहचान पत्र, भारत के राजचिह्न और 'सत्यमेव जयते' अंकित कार्ड तथा सरकारी बोर्ड लगी कार का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, लैपटॉप पर करोड़ों रुपये का बैंक बैलेंस दिखाकर भी उसने अपनी कथित आर्थिक और सरकारी पहुंच का प्रदर्शन किया।

चार्टर्ड अकाउंटेंट के जरिए हुई पहली मुलाकात

साइबर क्राइम सेल से मिली जानकारी के अनुसार, नवंबर 2025 में शिकायतकर्ता बैंक और लोन से संबंधित काम के सिलसिले में सूरत के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के संपर्क में आया था। बातचीत के दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट ने उसे बताया कि वह फॉरेंसिक ट्रेडिंग के माध्यम से लोगों का पैसा निवेश करवाकर अच्छा मुनाफा दिलाने का काम करता है। इसी दौरान उसने प्रियंक समीरभाई व्यास नामक व्यक्ति का परिचय कराया और दावा किया कि वह साइबर फॉरेंसिक विभाग का प्रमुख होने के साथ-साथ क्रिप्टोकरेंसी का विशेषज्ञ भी है। इसके बाद चार्टर्ड अकाउंटेंट ने मुंबई के एक होटल में शिकायतकर्ता की मुलाकात प्रियंक व्यास से कराई। आरोप है कि पहली मुलाकात से ही प्रियंक ने खुद को एक प्रभावशाली सरकारी अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया। उसकी कथित सरकारी पहचान, बातचीत के तरीके और दिखावे ने शिकायतकर्ता का भरोसा जीत लिया।

फर्जी पहचान और सरकारी प्रतीकों से बनाया विश्वास

आरोप के मुताबिक, प्रियंक व्यास ने अपनी कथित सरकारी पहचान को मजबूत दिखाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए। वह फर्जी सरकारी आईडी कार्ड लेकर चलता था, जिस पर भारत का राजचिह्न और 'सत्यमेव जयते' अंकित था। इसके अलावा सरकारी बोर्ड लगी कार और लैपटॉप पर करोड़ों रुपये का बैलेंस दिखाकर वह अपनी आर्थिक हैसियत का प्रदर्शन करता था। इन तमाम तरीकों से उसने पीड़ितों के मन में यह विश्वास पैदा करने की कोशिश की कि उसकी सरकारी विभागों में अच्छी पहुंच है और वह बड़े वित्तीय लेन-देन तथा क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े मामलों को सुलझाने में सक्षम है।

कभी IP सर्वर तो कभी बिटकॉइन रिकवरी के नाम पर वसूली

शिकायत के अनुसार, आरोपी ने व्यापारी को करोड़ों रुपये का फंड दिलाने और क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित वित्तीय लाभ का भरोसा दिया। इसके बाद अलग-अलग तकनीकी और वित्तीय प्रक्रियाओं का हवाला देकर लगातार पैसों की मांग की जाने लगी।कभी IP सर्वर की व्यवस्था करने, कभी फॉरेंसिक टेस्टिंग कराने, तो कभी क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजेक्शन और बिटकॉइन रिकवरी की प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर रकम मांगी गई। आरोप है कि इस तरह अलग-अलग बहाने बनाकर करीब 11 महीने तक शिकायतकर्ता और उसके परिचितों से पैसे लिए जाते रहे। हर बार किसी नई प्रक्रिया, तकनीकी खर्च या कथित रिकवरी का हवाला देकर भुगतान की मांग की जाती थी।

1.29 करोड़ से अधिक की ठगी, मामूली रकम लौटाई

इस पूरे मामले में सामने आए वित्तीय आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। शिकायत के मुताबिक, आरोपी को कुल 1 करोड़ 29 लाख 25 हजार 100 रुपये दिए गए थे। इनमें से केवल 4 लाख 70 हजार रुपये वापस किए गए। वहीं, शिकायत में 1 करोड़ 24 लाख 53 हजार 900 रुपये की रकम वापस मिलना शेष बताई गई है। इस प्रकार बड़ी धनराशि अब भी पीड़ित पक्ष को वापस मिलने का इंतजार है। लगातार रकम दिए जाने के बावजूद जब कथित फंड, निवेश और बिटकॉइन रिकवरी का वादा पूरा नहीं हुआ, तब पीड़ित को पूरे मामले पर संदेह हुआ। इसके बाद मामला साइबर क्राइम सेल तक पहुंचा।
साइबर ठगी का नया तरीका, आम लोगों और व्यापारियों के लिए चेतावनी

यह मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि साइबर ठग अब लोगों को निशाना बनाने के लिए केवल डिजिटल तकनीक का ही नहीं, बल्कि सरकारी पहचान, पद और प्रभाव का भी सहारा ले रहे हैं।फर्जी पहचान पत्र, सरकारी प्रतीक, विशेष पदनाम, महंगी गाड़ियां और लैपटॉप पर बड़ी रकम दिखाना किसी व्यक्ति की वास्तविक सरकारी हैसियत या आर्थिक विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं है। खासकर निवेश, क्रिप्टोकरेंसी और बिटकॉइन रिकवरी के नाम पर बड़ी रकम मांगने वालों से सतर्क रहना बेहद जरूरी है।

सरकारी अधिकारी बताने वाले व्यक्ति की पहचान जरूर करें

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की सामान्य सलाह है कि किसी भी व्यक्ति के सरकारी अधिकारी होने के दावे पर बिना सत्यापन भरोसा नहीं करना चाहिए। सरकारी विभाग का नाम लेकर निवेश या फंड दिलाने का दावा करने वाले व्यक्ति से संबंधित विभाग के आधिकारिक माध्यमों से उसकी पहचान की पुष्टि करनी चाहिए।

किसी भी निवेश योजना में पैसा लगाने से पहले उसकी वैधता, संबंधित संस्था का पंजीकरण और वित्तीय लेन-देन की वास्तविकता की जांच करना जरूरी है। बिटकॉइन रिकवरी या फॉरेंसिक जांच के नाम पर अग्रिम रकम मांगने वाले व्यक्तियों से विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

सूरत का यह मामला एक बड़ी चेतावनी है कि साइबर ठग अब भरोसे का नकली चेहरा पहनकर लोगों की जीवनभर की कमाई को निशाना बना रहे हैं। इसलिए किसी भी आकर्षक वित्तीय प्रस्ताव, सरकारी पहचान के दावे या करोड़ों के मुनाफे के लालच में आने से पहले पूरी जांच-पड़ताल करना ही सबसे बड़ा बचाव है।