रामगढ़ में सड़क की जमीन पर उलझा गाटा नंबरों का पेच! 193 और 207 के बीच भूमि विवाद ने पकड़ा तूल, पैमाइश और अभिलेख दुरुस्त कराने की मांग

रामगढ़ में सड़क की जमीन पर उलझा गाटा नंबरों का पेच! 193 और 207 के बीच भूमि विवाद ने पकड़ा तूल, पैमाइश और अभिलेख दुरुस्त कराने की मांग
  • आवेदक का दावा—मौके पर सड़क और राजस्व अभिलेख में दर्ज भूमि का मिलान नहीं; गाटा संख्या 193 की जमीन सड़क में शामिल होने का आरोप, 207 की भूमि पर कब्जे की आशंका जताकर जांच की मांग

आर.वी.9 न्यूज़ | संवाददाता, शुभम शर्मा, गोरखपुर, .प्र.

गोरखपुर/गोला।
गोला तहसील क्षेत्र के ग्राम रामगढ़ में गाटा संख्या 193 और 207 से जुड़ा भूमि विवाद अब प्रशासनिक जांच और पैमाइश की मांग तक पहुंच गया है। सड़क निर्माण, राजस्व अभिलेख और मौके की वास्तविक स्थिति में कथित अंतर को लेकर एक आवेदक ने संबंधित अधिकारियों के समक्ष विस्तृत शिकायत प्रस्तुत करते हुए मौके पर बनी सड़क की पैमाइश, भूमि की सीमांकन प्रक्रिया और राजस्व अभिलेखों को दुरुस्त कराने की मांग की है। मामले से संबंधित उपलब्ध दस्तावेजों में आवेदक शम्भूनाथ तिवारी, ग्राम रामगढ़, तहसील गोला, जिला गोरखपुर की ओर से दिए गए प्रार्थना पत्रों का उल्लेख है। पत्रों में गाटा संख्या 193, 194, 202 एवं 207 समेत सड़क से संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कराने की मांग उठाई गई है। मामला राष्ट्रीय राजमार्ग/राजमार्ग से संबंधित भूमि अधिग्रहण और मौके पर बनी सड़क की स्थिति से भी जुड़ा बताया गया है।


0.6210 हेक्टेयर भूमि से शुरू हुआ विवाद का सिलसिला

दस्तावेज में आवेदक ने गाटा संख्या 207 को अपनी मूल खातेदार भूमि बताते हुए उसका कुल रकबा 0.6210 हेक्टेयर दर्ज होने का उल्लेख किया है। शिकायत के अनुसार, इसी भूमि की उत्तरी सीमा पर राजमार्ग/राजमार्ग मार्ग का निर्माण किया गया है। आवेदक का कहना है कि राजमार्ग के लिए भूमि अधिग्रहण से संबंधित अभिलेखों और मौके की स्थिति में अंतर दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से गाटा संख्या 193 की भूमि को लेकर दावा किया गया है कि अभिलेख में जितनी भूमि अधिग्रहित दिखाई गई है, मौके पर सड़क की स्थिति उससे कहीं अधिक क्षेत्र में दिखाई देती है। यही अंतर अब पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी बन गया है।


कागजों में 21 वर्गमीटर, मौके पर पूरी भूमि सड़क में शामिल होने का दावा

शिकायत के अनुसार, राजमार्ग के अधिग्रहण संबंधी अभिलेख में गाटा संख्या 193 में 21 वर्गमीटर भूमि का अधिग्रहण दर्शाया गया है। वहीं आवेदक का दावा है कि मौके पर तैयार सड़क की स्थिति और भूचित्र को देखने पर गाटा संख्या 193 का पूरा हिस्सा सड़क में शामिल दिखाई देता है। यानी सवाल यह है कि यदि अभिलेख में केवल सीमित क्षेत्र का अधिग्रहण दर्ज है, तो मौके पर सड़क का वास्तविक फैलाव किस भूमि तक है? इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए आवेदक ने मौके पर पुनः पैमाइश और सीमांकन कराने की मांग की है।


गाटा 193 बनाम गाटा 207—किसकी जमीन कहां तक?

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि गाटा संख्या 193 के खातेदारों की भूमि में मौके पर सड़क का निर्माण हो चुका है, लेकिन कथित रूप से उनके हिस्से के बराबर भूमि पर गाटा संख्या 207 की भूमि की ओर कब्जे की स्थिति उत्पन्न हो रही है।

आवेदक ने अंतिम भूचित्र/नक्शे का हवाला देते हुए कहा है कि गाटा संख्या 207 का सीमांकन करने पर दक्षिणी हिस्से से लेकर पूर्वी और पश्चिमी दिशा में बनी पक्की सड़क तक स्थिति स्पष्ट होती है। शिकायतकर्ता के अनुसार, यदि गाटा संख्या 193 का पूरा भाग सड़क में शामिल माना जाता है, तो गाटा संख्या 193 से संबंधित खातेदारों द्वारा गाटा संख्या 207 की ओर निर्माण या कब्जे की स्थिति की भी जांच आवश्यक है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि संबंधित राजस्व एवं प्रशासनिक अधिकारियों की जांच के बाद ही हो सकेगी।


पैमाइश के बाद भी उठे सवाल

दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि पैमाइश के बाद राजस्व विभाग की टीम द्वारा अभिलेखों के आधार पर गाटा संख्या 193 की भूमि को आवेदक की गाटा संख्या 207 से संबंधित क्षेत्र में पैमाइश किए जाने की बात सामने आई।

इसके अलावा शिकायतकर्ता ने यह भी कहा है कि भूमि अध्याप्ति अधिकारी से मिले सवाल-जवाब और एनएचएआई द्वारा निकाली गई सूची में भी अंतर दिखाई देता है। इस कथित अंतर को दूर करने के लिए संबंधित अभिलेखों, अंतिम भूचित्र, अधिग्रहण रिकॉर्ड और मौके की स्थिति का आपस में मिलान कराने की मांग की गई है।


राजस्व अभिलेख और मौके की स्थिति का हो आमना-सामना

मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह केवल निजी भूमि विवाद तक सीमित नहीं है। इसमें राजस्व रिकॉर्ड, भूमि अधिग्रहण, सड़क निर्माण और सरकारी अभिलेखों की शुद्धता जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं। शिकायतकर्ता ने अधिकारियों से मांग की है कि गाटा संख्या 207, 192, 193, 194 और 195 में मौके पर बनी सड़क की विधिवत पैमाइश कराई जाए। इसके बाद जिस भूमि पर सड़क वास्तविक रूप से बनी है, उसके अनुसार रकबा निर्धारित कर अभिलेखों में आवश्यक सुधार किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि कौन-सी भूमि राजमार्ग के लिए अधिग्रहित हुई, किस गाटा में कितनी भूमि दर्ज है और मौके पर सड़क वास्तव में किस सीमा तक बनी हुई है।


प्रशासन के सामने अब तीन बड़े सवाल

इस पूरे मामले में दस्तावेजों के आधार पर मुख्य रूप से तीन सवाल सामने आते हैं—

पहला— राजस्व अभिलेख में दर्ज अधिग्रहित भूमि और मौके पर बनी सड़क के क्षेत्रफल में यदि अंतर है तो उसकी वजह क्या है?

दूसरा— गाटा संख्या 193 की भूमि और गाटा संख्या 207 की भूमि की वास्तविक सीमा मौके पर कहां तक है?

तीसरा— अंतिम भूचित्र, राजस्व अभिलेख, भूमि अधिग्रहण संबंधी दस्तावेज और एनएचएआई की सूची में यदि अंतर है तो सही रिकॉर्ड कौन-सा है?

इन सवालों का जवाब संयुक्त पैमाइश और अभिलेखों के तुलनात्मक परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।


लंबे समय से चल रही कवायद के बीच फिर उठी निष्पक्ष पैमाइश की मांग

उपलब्ध दस्तावेजों से यह भी संकेत मिलता है कि शिकायतकर्ता ने अलग-अलग स्तरों पर अपनी समस्या उठाई है। एक आवेदन में राजमार्ग से संबंधित अधिकारियों को मामले से अवगत कराया गया, जबकि दूसरे आवेदन में भूमि की पैमाइश कराकर अभिलेख दुरुस्त कराने की मांग की गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि विवाद के कारण संबंधित खातेदारों के बीच तनाव और विवाद की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में किसी भी संभावित टकराव को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जल्द और निष्पक्ष तरीके से भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।


अब निगाहें प्रशासनिक जांच पर

रामगढ़ का यह मामला अब सिर्फ दो गाटा नंबरों के बीच जमीन के विवाद का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रहा है कि सरकारी सड़क निर्माण और राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि का वास्तविक मिलान कितना सटीक है। यदि मौके की पैमाइश में अभिलेखों से अंतर सामने आता है तो नियमानुसार रिकॉर्ड में सुधार और संबंधित भूमि की स्थिति स्पष्ट करना प्रशासन की अगली जिम्मेदारी होगी। वहीं यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही नहीं पाए जाते हैं तो पैमाइश और अभिलेखीय जांच के माध्यम से स्थिति स्वतः साफ हो जाएगी।

फिलहाल आवेदक ने गाटा संख्या 207 समेत संबंधित गाटा संख्याओं की मौके पर पैमाइश, सड़क की वास्तविक चौड़ाई/सीमा निर्धारित करने तथा राजस्व अभिलेखों को मौके की स्थिति के अनुरूप दुरुस्त कराने की मांग की है।

सबसे बड़ा सवाल यही—कागजों में दर्ज जमीन और जमीन पर बनी सड़क, आखिर दोनों की सीमा कहां मिलती है?

नोट: यह समाचार उपलब्ध प्रार्थना पत्रों और दस्तावेजों में दर्ज दावों/आरोपों के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि प्रशासनिक जांच, आधिकारिक पैमाइश और संबंधित अभिलेखों के सत्यापन के बाद ही मानी जाएगी।