जे.के. एक्सप्रेस और जे.के. ट्रांसलाइन में 11 साल से काम कर रहे अकाउंटेंट पर गंभीर आरोप, परिवार-रिश्तेदारों के खातों में पहुंचाई गई करोड़ों की रकम
- एक्सेल शीट में हेराफेरी कर 10.84 करोड़ का कथित गबन!

सूरत। शहर के मगदल्ला क्षेत्र से परिवहन कारोबार से जुड़ा एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। प्रसिद्ध परिवहन कंपनियों जे.के. एक्सप्रेस और जे.के. ट्रांसलाइन में करीब 11 वर्षों से अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी पर कंपनी के साथ कथित तौर पर 10.84 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और गबन करने का आरोप लगा है। आरोप है कि अकाउंटेंट ने कंपनी की ऑनलाइन बैंकिंग व्यवस्था और भुगतान प्रक्रिया का फायदा उठाते हुए थोक भुगतान के लिए तैयार की जाने वाली एक्सेल शीट में हेराफेरी की। पेट्रोलियम कंपनियों को किए जाने वाले भुगतान में कथित तौर पर लाभार्थी के नाम के स्थान पर अपने परिवार, रिश्तेदारों और परिचितों के बैंक खातों की जानकारी दर्ज कर दी गई। इस तरह कंपनी की करोड़ों रुपये की रकम कथित तौर पर निजी बैंक खातों में पहुंचती रही। मामले की गंभीरता सामने आने के बाद डुमस पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई है, जबकि पुलिस की जांच में कथित वित्तीय नेटवर्क और उससे जुड़े लोगों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है।

11 साल का भरोसा बना धोखे का आधार!
पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, वेसु क्षेत्र में नहर रोड स्थित मनी आर्केड के समीप राजहंस रॉयल टेंड के निवासी जितेंद्र बंसीलाल गुप्ता (50) जे.के. एक्सप्रेस और जे.के. ट्रांसलाइन नाम से परिवहन व्यवसाय संचालित करते हैं। कंपनी का कार्यालय मगदल्ला एयरपोर्ट रोड स्थित राजहंस मोंटेस में बताया गया है। कंपनी के वाहन मुंबई और राजकोट सहित विभिन्न मार्गों पर संचालित होते हैं और इनमें मशीनरी तथा टेक्सटाइल से संबंधित माल का परिवहन किया जाता है। शिकायत के मुताबिक, परिन भरतभाई टेलर, निवासी बारडोली, पिछले करीब 11 वर्षों से कंपनी में अकाउंटेंट के रूप में कार्यरत था। उसे लगभग 35 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था। लंबे समय से कंपनी से जुड़े होने के कारण उसे कंपनी के वित्तीय कामकाज, ऑनलाइन बैंकिंग और अकाउंट मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। यही भरोसा कथित तौर पर कंपनी के लिए सबसे बड़ा वित्तीय संकट बन गया।
एक्सेल शीट में बदला लाभार्थी, बदल गई करोड़ों की दिशा
कंपनी की ओर से IOCL, HPCL, BPCL जैसी पेट्रोलियम कंपनियों को डीजल और ईंधन का भुगतान करने के लिए थोक भुगतान की एक्सेल शीट तैयार की जाती थी। आरोप है कि इसी प्रक्रिया में परिन टेलर ने कथित रूप से एक्सेल शीट में हेराफेरी शुरू की। कागजों पर भुगतान पेट्रोलियम कंपनियों के नाम से दिखाई देता रहा, लेकिन बैंकिंग विवरण में कथित तौर पर अपने और अपने करीबियों के खाते दर्ज कर दिए गए। शिकायत के अनुसार, इन खातों में उसकी पत्नी, भाई, भाभी, माता तथा अन्य रिश्तेदारों और परिचितों के बैंक खाते शामिल थे। इस तरह कंपनी के खाते से निकलने वाली रकम कथित तौर पर पेट्रोलियम कंपनियों के खातों में जाने के बजाय अलग-अलग निजी खातों में पहुंचती रही।
मामला तब खुला, जब 10 लाख के भुगतान में आया 1 लाख का अंतर
इस कथित घोटाले का खुलासा फरवरी 2026 में उस समय हुआ, जब कंपनी के मालिक के बेटे अरिन गुप्ता ने मुंबई स्थित भवानी पेट्रोल पंप से संबंधित भुगतान की जांच की। बताया गया कि पेट्रोल पंप को नियमित रूप से लगभग 10 लाख रुपये साप्ताहिक भुगतान किया जाना था, लेकिन रिकॉर्ड की जांच में पेट्रोल पंप को करीब 9 लाख रुपये ही प्राप्त होने की बात सामने आई। महज एक लाख रुपये के इस अंतर ने कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड पर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद भुगतान संबंधी दस्तावेजों और बैंक रिकॉर्ड की गहन जांच शुरू की गई।
सीए और विशेषज्ञों की जांच में खुलती चली गईं परतें
मामले की विस्तृत जांच के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट मनीष सोनी सहित अन्य विशेषज्ञों की मदद ली गई। खातों, बैंक ट्रांजेक्शन, एक्सेल शीट और भुगतान रिकॉर्ड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कथित वित्तीय अनियमितताओं की परतें खुलती चली गईं। जांच में कथित तौर पर यह सामने आया कि पेट्रोलियम कंपनियों को किए जाने वाले भुगतान के रिकॉर्ड में बदलाव कर बड़ी रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर की गई थी। कंपनी के अनुसार, इस पूरे मामले में केवल एक व्यक्ति ही नहीं, बल्कि कई लोगों के खातों और कथित लेनदेन की भूमिका सामने आई है।
पेट्रोल-डीजल के नाम पर भी लाखों की कथित हेराफेरी
मामले की जांच में केवल बैंक ट्रांसफर ही नहीं, बल्कि ईंधन खरीद से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की बात भी सामने आई। आरोप है कि कंपनी द्वारा निर्धारित परिवहन मार्गों और अधिकृत पेट्रोल पंपों के अलावा हरियाणा, हिसार और कलंबोली जैसे स्थानों पर कथित तौर पर अनधिकृत पंपों से निजी वाहनों में 54.82 लाख रुपये से अधिक का पेट्रोल-डीजल भरवाया गया। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल अकाउंटिंग में हेराफेरी नहीं, बल्कि कंपनी के संसाधनों के कथित दुरुपयोग का भी गंभीर मामला माना जाएगा।
बिना कारोबार के फर्जी बिल और वाउचर का आरोप
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ ऐसी कंपनियों के नाम से फर्जी बिल और वाउचर तैयार किए गए, जिनके साथ कंपनी का वास्तविक कारोबार नहीं था। गोपी आर्ट्स और डीकेडी फ्रूट एंड वेजिटेबल प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों से संबंधित कथित फर्जी बिलिंग के जरिए भी कंपनी की रकम निकालने का आरोप है। इसके अलावा हेलिकॉन ट्रेडिंग हाउस प्राइवेट लिमिटेड के परिवहन कार्य से संबंधित कथित फर्जी बिल तैयार कर करीब 1.70 करोड़ रुपये से अधिक की रकम के गबन का आरोप लगाया गया है।
कथित घोटाले की रकम से खड़ी की नई परिवहन कंपनियां!
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पुलिस शिकायत के अनुसार कथित तौर पर हेराफेरी से प्राप्त रकम का इस्तेमाल नई कारोबारी गतिविधियां शुरू करने में भी किया गया। आरोप है कि परिन टेलर ने अपने भाई और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर जय कुबेर ट्रांसपोर्ट, जय कुबेर लॉजिस्टिक्स और कॉन्मोंट बिल्डस्पेस जैसी नई कंपनियां शुरू कीं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कथित धोखाधड़ी से प्राप्त धनराशि से 10 से 12 नए ट्रक तथा अन्य संपत्तियां खरीदी गईं। इसके अलावा सूरत और नवी मुंबई के कलंबोली क्षेत्र में फ्लैट सहित अन्य मूल्यवान संपत्तियां हासिल करने की बात भी जांच में सामने आने का दावा किया गया है।
32 लोगों के खिलाफ मामला, 9 आरोपी गिरफ्तार
परिवहन व्यवसायी जितेंद्र बंसीलाल गुप्ता की शिकायत के आधार पर डुमस पुलिस स्टेशन में परिन भरतभाई टेलर, उसकी पत्नी तेजल टेलर, भाई प्रतीक टेलर, भाभी आरती टेलर, माता गीता टेलर तथा अन्य रिश्तेदारों और परिचितों समेत कुल 32 लोगों के खिलाफ कथित धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है। पुलिस जांच में मामले की गंभीरता को देखते हुए ई-को सेल के पीआई सोलंकी द्वारा जांच किए जाने की जानकारी सामने आई है। पुलिस ने कथित घोटाले के मुख्य आरोपी परिन टेलर और उसके परिवार से जुड़े लोगों सहित 9 आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी है।अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित तौर पर हेराफेरी की गई रकम कितने खातों में गई, किन लोगों को इसका लाभ मिला और इस पूरे नेटवर्क में किस-किस की भूमिका थी।
एक एक्सेल शीट से शुरू हुआ शक, करोड़ों के कथित घोटाले तक पहुंची जांच
इस पूरे मामले ने कारोबारी जगत में भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक छोटी-सी भुगतान विसंगति से शुरू हुई जांच कथित तौर पर 10.84 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले तक पहुंच गई। यह मामला यह भी बताता है कि आधुनिक कारोबार में डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन भुगतान जितने सुविधाजनक हैं, उतनी ही मजबूत आंतरिक जांच और निगरानी भी जरूरी है। खासकर थोक भुगतान, एक्सेल आधारित बैंकिंग डेटा और लाभार्थी खातों की जांच में छोटी-सी लापरवाही भी कंपनी को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती है। फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और आरोपों से जुड़े बैंक खातों, दस्तावेजों, संपत्तियों तथा वित्तीय लेनदेन की पड़ताल की जा रही है। घोटाले में शामिल लोगों की वास्तविक भूमिका और रकम के अंतिम इस्तेमाल की तस्वीर जांच पूरी होने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
नोट: यह समाचार उपलब्ध शिकायत और जांच संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच के निष्कर्षों के अधीन है।







