सुल्तानपुर से उठी एक संवेदना की कहानी: कैंसर-टीबी से जूझते रामचेत मोची का निधन, राहुल गांधी ने परिजनों से की बात — दिया हरसंभव मदद का भरोसा

सुल्तानपुर से उठी एक संवेदना की कहानी: कैंसर-टीबी से जूझते रामचेत मोची का निधन, राहुल गांधी ने परिजनों से की बात — दिया हरसंभव मदद का भरोसा

सुल्तानपुर | ज़िंदगी की जद्दोजहद में हर दिन संघर्ष करने वाले रामचेत मोची अब इस दुनिया में नहीं रहे। कैंसर और टीबी जैसी दोहरी बीमारी से जूझते हुए उन्होंने सोमवार की सुबह अंतिम सांस ली। उनके निधन की ख़बर जैसे ही सामने आई, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने खुद फोन कर परिजनों से बात की और गहरी संवेदना व्यक्त की

राहुल गांधी ने शोक संदेश में कहा —

“रामचेत जी जैसे मेहनती और जुझारू लोग हमारे समाज की असली ताकत हैं। उनके परिवार के साथ मैं खड़ा हूं, हरसंभव मदद की जाएगी।”

बताया जा रहा है कि राहुल गांधी ने न केवल फोन पर बात की, बल्कि अमेठी और सुल्तानपुर जिलों से कांग्रेस का प्रतिनिधि मंडल भी भेजा ताकि परिवार की आर्थिक और चिकित्सीय मदद तुरंत सुनिश्चित की जा सके।

कौन थे रामचेत मोची?

रामचेत मोची का नाम भले ही साधारण लगे, लेकिन उनकी ज़िंदगी असाधारण हौसले की मिसाल थी। सुल्तानपुर के एक छोटे से मोहल्ले में जूते-चप्पल की मरम्मत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले रामचेत समाज में ईमानदारी और परिश्रम के प्रतीक माने जाते थे। बताया जाता है कि राहुल गांधी के अमेठी दौरे के दौरान एक बार उनकी मुलाकात रामचेत से हुई थी। बातचीत के दौरान राहुल गांधी ने उनके काम और जज्बे की तारीफ की थी और उनसे कहा था —

“आप जैसे लोग ही भारत की असली रीढ़ हैं।”

उसी मुलाकात के बाद से रामचेत और उनके परिवार का राहुल गांधी से भावनात्मक जुड़ाव बन गया था।

बीमारी और संघर्ष

पिछले कुछ महीनों से रामचेत कैंसर और टीबी से पीड़ित थे। आर्थिक तंगी के बावजूद वे इलाज के लिए संघर्ष करते रहे। गांव वालों ने चंदा जुटाया, स्थानीय नेताओं ने मदद की, लेकिन बीमारी ने आखिरकार उनका साथ नहीं छोड़ा।

उनकी पत्नी ने नम आंखों से कहा —

“राहुल जी का फोन आया तो लगा जैसे बेटा अपने पिता को याद कर रहा हो। अब बस चाहत यही है कि हमारे बच्चों का भविष्य बेहतर हो।”

मानवीय पहल का संदेश

रामचेत मोची की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि गरीबी, बीमारी और संवेदना के बीच की सच्ची तस्वीर है। राहुल गांधी का यह कदम इस बात का प्रतीक है कि राजनीति से परे भी इंसानियत की डोर हमेशा जीवित रहती है।

यह कहानी बताती है — जब नेता जनता से सीधे जुड़ते हैं, तब राजनीति नहीं, रिश्ते बनते हैं।