कौड़ीराम में सिंचाई विभाग की नहर बदहाल, सफाई के नाम पर खानापूर्ति का आरोप—टूटे किनारों से किसानों की बढ़ी चिंता
- गोयल मिल के बगल से गुजर रही नहर में उगी झाड़ियां और जलकुंभी, कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त हैं नहर के किनारे; ग्रामीणों का आरोप—शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार बेखबर
आर.वी.9 न्यूज़ | संवाददाता, गंगासागर पाण्डेय, कौड़ीराम, गोरखपुर, उ.प्र.
गोरखपुर/कौड़ीराम।
कौड़ीराम क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाने वाली नहर इन दिनों बदहाली की तस्वीर पेश कर रही है। गोयल मिल के बगल से होकर गुजर रही सिंचाई विभाग की नहर में जगह-जगह घनी झाड़ियां, जलकुंभी और खरपतवार फैल गए हैं। नहर में पानी का प्रवाह प्रभावित होने के साथ-साथ इसके किनारे भी कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त नजर आ रहे हैं। ऐसे में किसानों को जहां सिंचाई व्यवस्था को लेकर चिंता सता रही है, वहीं किसी बड़े हादसे की आशंका भी बनी हुई है।
नहर में सफाई के बजाय बढ़ती जा रही गंदगी
स्थानीय लोगों का कहना है कि नहर की नियमित सफाई और मरम्मत समय रहते कर दी जाए तो कई समस्याओं को पैदा होने से पहले ही रोका जा सकता है। लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि नहर की देखरेख को लेकर जिम्मेदार विभाग गंभीर नहीं है। पानी के भीतर और किनारों पर उगी वनस्पतियों ने नहर के बड़े हिस्से को ढक लिया है, जिससे नहर का वास्तविक स्वरूप तक स्पष्ट नजर नहीं आता। ग्रामीणों का आरोप है कि अक्सर किसी घटना या शिकायत के बाद ही विभागीय स्तर पर कार्रवाई दिखाई देती है। उस समय कुछ हिस्सों में आनन-फानन में सफाई कराकर जिम्मेदारी पूरी करने की कोशिश की जाती है, लेकिन नियमित रखरखाव और स्थायी समाधान पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
टूटे नहर किनारे किसानों के लिए बने मुसीबत
नहर के कई हिस्सों में टूट-फूट की स्थिति होने की बात सामने आ रही है। स्थानीय किसानों के अनुसार, नहर का पानी खेतों की ओर फैलने से पहले भी कई किसानों को नुकसान उठाना पड़ा है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत नहीं कराई गई तो आने वाले दिनों में समस्या और गंभीर हो सकती है। बरसात के मौसम में नहर में पानी का दबाव बढ़ने पर कमजोर किनारे टूटने की आशंका और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में खेतों में पानी भरने से फसलों को नुकसान होने के साथ-साथ आसपास के रास्तों और आबादी पर भी असर पड़ सकता है।
शिकायतों के बाद भी कार्रवाई पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस समस्या को लेकर कई बार बांसगांव एसडीएम को सूचना दी जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है। ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर किसी बड़ी घटना का इंतजार क्यों किया जा रहा है? जब समस्या पहले से दिखाई दे रही है तो प्रशासन और सिंचाई विभाग को समय रहते कदम क्यों नहीं उठाना चाहिए? लोगों का कहना है कि सरकारी व्यवस्था का उद्देश्य किसी दुर्घटना के बाद राहत पहुंचाना ही नहीं, बल्कि दुर्घटना की आशंका को पहले ही खत्म करना भी होना चाहिए। यदि नहर की नियमित जांच, सफाई और मरम्मत होती रहे तो भविष्य में होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।
ठेकेदारी व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
ग्रामीणों ने नहर की सफाई व्यवस्था में ठेकेदारी प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि सफाई का ठेका लेने के बाद कई बार व्यापक और स्थायी सफाई के बजाय केवल औपचारिकता पूरी करने की कोशिश की जाती है। कुछ हिस्सों में थोड़ी-बहुत सफाई के बाद काम पूरा मान लिया जाता है, जबकि नहर के दूसरे हिस्से फिर से झाड़ियों और जलकुंभी से पट जाते हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित विभाग या ठेकेदार का पक्ष सामने आना बाकी है। ऐसे में पूरे मामले में विभागीय जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सवाल सिर्फ नहर की सफाई का नहीं, किसानों की सुरक्षा का भी
नहरें केवल पानी पहुंचाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि हजारों किसानों की खेती और उनकी आजीविका से जुड़ी महत्वपूर्ण व्यवस्था हैं। ऐसे में नहरों की समय पर सफाई, सिल्ट हटाने, जलकुंभी और झाड़ियों की कटाई तथा टूटे किनारों की मरम्मत को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है। कौड़ीराम की इस नहर की तस्वीरें भी यही सवाल खड़ा करती हैं कि क्या जिम्मेदार विभाग किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा या उससे पहले ही आवश्यक कदम उठाए जाएंगे?
ग्रामीणों की मांग—हादसे का इंतजार नहीं, पहले हो समाधान
स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने प्रशासन तथा सिंचाई विभाग से मांग की है कि नहर का स्थलीय निरीक्षण कराकर पूरी लंबाई में सफाई कराई जाए, जलकुंभी व झाड़ियों को हटाया जाए और जहां-जहां नहर के किनारे टूटे हैं, वहां तत्काल मरम्मत कराई जाए। साथ ही सफाई कार्य की गुणवत्ता की भी जांच हो, ताकि सरकारी धन का सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
अब देखना यह है कि ग्रामीणों की शिकायत और सामने आई तस्वीरों के बाद जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या को कितनी गंभीरता से लेते हैं। सवाल सीधा है—जब खतरा सामने दिखाई दे रहा है, तो कार्रवाई किसी घटना के बाद क्यों?







