माटी की महक से आत्मनिर्भरता का महाअभियान: उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड स्थापना पखवाड़ा बना कारीगरों के सम्मान और स्वाभिमान का उत्सव
- 16 से 31 जुलाई तक पूरे प्रदेश में गूंजा ‘माटी से आत्मनिर्भरता’ का संदेश, कारीगरों को मिलेगा नया मंच, नई पहचान और नए अवसर
लखनऊ/विशेष संवाददाता।
उत्तर प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्पकला और लाखों कारीगरों के जीवन में नई ऊर्जा का संचार करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड द्वारा आयोजित "माटीकला बोर्ड स्थापना पखवाड़ा" पूरे प्रदेश में उत्साह और गौरव के साथ मनाया जा रहा है। 16 जुलाई से 31 जुलाई 2026 तक चल रहे इस विशेष अभियान के केंद्र में 19 जुलाई को मनाया गया बोर्ड का नवां स्थापना दिवस रहा, जिसने प्रदेश के कुम्हारों और माटीकला से जुड़े कारीगरों को सम्मान, पहचान और आत्मनिर्भरता का नया विश्वास दिया। "माटी से आत्मनिर्भरता, परंपरा से समृद्धि" की प्रेरक थीम पर आधारित यह अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रदेश की सदियों पुरानी मिट्टी की कला को आधुनिक बाजार, नई तकनीक और बेहतर आजीविका से जोड़ने का व्यापक जनआंदोलन बनता दिखाई दे रहा है।

मिट्टी के हर चाक में छिपा है आत्मनिर्भर भारत का सपना
भारतीय सभ्यता में मिट्टी केवल एक तत्व नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जीवन का प्रतीक रही है। दीपक से लेकर घड़ा, सुराही, कलश, सजावटी वस्तुएं और धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त सामग्री तक, माटीकला भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। समय के साथ आधुनिक उत्पादों के बढ़ते प्रभाव से पारंपरिक कारीगरों के सामने आर्थिक चुनौतियां बढ़ीं। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड का यह अभियान इन कारीगरों के लिए आशा की नई किरण बनकर सामने आया है। इसका उद्देश्य पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और बाजार से जोड़कर रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना है।
कारीगरों को मिलेगा सम्मान के साथ आर्थिक सशक्तिकरण
माटीकला बोर्ड द्वारा आयोजित इस पखवाड़े में प्रदेशभर में विभिन्न जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाना है। इस अभियान के अंतर्गत—
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माटीकला उत्पादों की प्रदर्शनी एवं बिक्री का आयोजन।
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पारंपरिक कारीगरों का पंजीकरण एवं आंकड़ा संकलन।
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विभागीय योजनाओं एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी।
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स्वरोजगार स्थापित करने के लिए ऋण आवेदन एवं वित्तीय सहायता का मार्गदर्शन।
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विद्युत चालित चाक एवं आधुनिक उपकरणों का प्रदर्शन।
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माटीकला सहकारी समितियों के गठन हेतु प्रेरणा।
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पर्यावरण-अनुकूल एवं स्थानीय उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा।
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आधुनिक डिज़ाइन, गुणवत्ता सुधार और विपणन के नए तरीकों की जानकारी।
इन गतिविधियों के माध्यम से पारंपरिक कुम्हार समुदाय को नई तकनीक से जोड़ते हुए उनकी आय बढ़ाने की दिशा में प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं।
पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल
प्रदेश सरकार का उद्देश्य केवल परंपरा को संरक्षित करना नहीं, बल्कि उसे आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप विकसित करना भी है। अब कारीगरों को पारंपरिक हाथ से चलने वाले चाक के साथ-साथ विद्युत चालित चाक, आधुनिक उपकरण, बेहतर डिज़ाइन, आकर्षक पैकेजिंग तथा डिजिटल मार्केटिंग की जानकारी भी उपलब्ध कराई जा रही है। इससे उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ेगी, उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच आसान बनेगी।
स्थानीय उत्पादों को मिलेगा नया बाजार
"लोकल फॉर वोकल" और "आत्मनिर्भर भारत" की भावना को मजबूत करते हुए माटीकला बोर्ड स्थानीय उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिट्टी से बने पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों का उपयोग व्यापक स्तर पर बढ़ता है तो इससे न केवल प्लास्टिक प्रदूषण कम होगा बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। दीपावली, विवाह, धार्मिक आयोजनों और घरेलू उपयोग की वस्तुओं में मिट्टी के उत्पादों की बढ़ती मांग कारीगरों के लिए नए अवसर लेकर आ रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई गति
माटीकला केवल एक पारंपरिक कला नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत आधारशिला भी है। प्रदेश सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कारीगरों को ऋण, प्रशिक्षण, विपणन सहायता और तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जिससे वे स्वरोजगार स्थापित कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्येक जिले में माटीकला क्लस्टर विकसित किए जाएं तो हजारों युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है और पलायन की समस्या में भी कमी आएगी।
जागरूकता अभियान से जुड़ रहे हजारों कारीगर
स्थापना पखवाड़े के दौरान जिला स्तर पर प्रदर्शनी, कार्यशाला, प्रशिक्षण शिविर और जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में कारीगर, स्वयं सहायता समूह, युवा उद्यमी तथा आम नागरिक भाग लेकर मिट्टी के उत्पादों की उपयोगिता और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इस अभियान का उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं का प्रचार नहीं, बल्कि समाज में माटीकला के प्रति सम्मान और अपनत्व की भावना विकसित करना भी है।
ऑनलाइन आवेदन और सहायता की सुविधा
माटीकला बोर्ड ने कारीगरों की सुविधा के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था भी उपलब्ध कराई है, ताकि अधिक से अधिक लोग सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। इसके साथ ही जिला उद्योग कार्यालयों के माध्यम से भी आवेदन, प्रशिक्षण और योजनाओं की जानकारी प्रदान की जा रही है। सहायता के लिए टोल-फ्री नंबर 1800-120-7699 भी उपलब्ध है।
माटी से जुड़ना, संस्कृति से जुड़ना है
विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी के उत्पाद केवल उपयोग की वस्तुएं नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के प्रतीक हैं। जब समाज स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पाद अपनाता है, तब केवल एक वस्तु नहीं खरीदता बल्कि एक परिवार की आजीविका, एक परंपरा और एक विरासत को जीवित रखने में योगदान देता है।
उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड स्थापना पखवाड़ा केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि प्रदेश की मिट्टी, संस्कृति और कारीगरों के सम्मान का जनोत्सव बनकर उभरा है। यह अभियान पारंपरिक कला को आधुनिक अवसरों से जोड़ते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का प्रयास है। यदि समाज स्थानीय मिट्टी के उत्पादों को प्राथमिकता देता है और युवा पीढ़ी इस पारंपरिक कला को अपनाने के लिए आगे आती है, तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तर प्रदेश की माटीकला देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी अलग पहचान बनाएगी।
"माटी का सम्मान ही कारीगर का सम्मान है, और कारीगर का सम्मान ही आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश की मजबूत नींव है।"







