सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्ज़ा, 23 साल से इंसाफ की राह देख रहा पीड़ित

सरकारी जमीन पर भू-माफियाओं का कब्ज़ा, 23 साल से इंसाफ की राह देख रहा पीड़ित

  • ब्यूरो रिपोर्ट — प्रेम कुमार शुक्ल, अमेठी (उत्तर प्रदेश)

अमेठी में कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने के सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सरकारी जमीन हो या भूमि धरी खाता — भू-माफियाओं के कब्ज़े और अधिकारियों की लापरवाही ने शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं पर पानी फेर दिया है। पीड़ित लोग तहसील दिवस से लेकर जिला और मंडल स्तर तक अपनी फरियाद ले जाते हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। नाप-जोख (पैमाइश) और रिपोर्ट के बाद भी कार्यवाही अधूरी रह जाती है। कई मामलों में राजस्व व अन्य विभागों के अधिकारी मौके पर जाना तक जरूरी नहीं समझते, मानो वे गहरी नींद में हों।सबसे गंभीर स्थिति तब होती है, जब चकमार्ग, खलिहान, तालाब, अनुसूचित जाति आबादी, नाली जैसी सार्वजनिक संपत्तियों पर भू-माफिया आलीशान मकान, शौचालय और पक्के निर्माण खड़े कर लेते हैं। और जब पीड़ित शिकायत करता है, तो उसे कहा जाता है — "दीवानी न्यायालय जाइये" — जबकि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही वह प्रशासन को लिखित सूचना दे चुका होता है।

23 साल का इंतजार, फिर भी न्याय अधूरा
असदापुर वार्ड नंबर 15, नगर पालिका परिषद के निवासी राधेश्याम तिवारी का मामला इसका जीता-जागता उदाहरण है। उनके अनुसार, गाटा संख्या 107 व 146 सरकारी चकमार्ग है, और 91 व 94 भूमि धरी खाता। पिछले 23 वर्षों से वह अधिकारियों को अपनी व्यथा सुना रहे हैं, लेकिन अब तक सरकारी जमीन खाली नहीं कराई गई।

तिवारी का आरोप है कि उन्होंने तहसील, जिला और मंडल के स्तर पर कई बार गुहार लगाई, लेकिन प्रभावी कार्रवाई के बजाय मामला फाइलों में दबा दिया गया। अब सवाल यह है कि क्या पीड़ित की जमीन से अवैध कब्जे हटेंगे और सार्वजनिक संपत्ति को मुक्त कराया जाएगा, या यह मामला भी कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगा?