सनातन केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाली जीवन-शैली है — लेटाघाट सरयू तट पर गूंजा हिंदू संगम का वैचारिक शंखनाद

सनातन केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाली जीवन-शैली है — लेटाघाट सरयू तट पर गूंजा हिंदू संगम का वैचारिक शंखनाद
  • आर.वी.9 न्यूज़ | संवाददाता, शुभम शर्मा

बड़हलगंज (गोरखपुर)।
सरयू की पावन लहरों के सान्निध्य में स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर गुरुवार को सनातन चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक एकता का विराट केंद्र बन गया। अवसर था हिंदू संगम कार्यक्रम का, जिसमें जिले भर से आए विभिन्न समाजों, संगठनों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर सनातन संस्कृति की महिमा और उसकी वैश्विक उपयोगिता पर गंभीर मंथन किया। पूरा वातावरण वेद मंत्रों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और राष्ट्र–धर्म के उद्घोष से अनुप्राणित दिखाई दिया।


सनातन विचारधारा का जीवंत मंच बना लेटाघाट

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक रमेश भाई रहे। अपने ओजस्वी और विचारोत्तेजक संबोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। यह मनुष्य को मनुष्य से, समाज को समाज से और मानवता को संपूर्ण सृष्टि से जोड़ने वाली चेतना है।”

उन्होंने कहा कि हिंदू सभ्यता सनातन संस्कृति से जन्मी दुनिया की सबसे प्राचीन, सहिष्णु और मानवीय सभ्यताओं में से एक है, जिसका मूल मंत्र ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ रहा है।


शांति, सहअस्तित्व और चेतना का संदेश

रमेश भाई ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि हिंदू समाज का इतिहास आक्रमण का नहीं, बल्कि आत्मरक्षा, शांति और सहअस्तित्व का रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति ने सदैव संवाद, समन्वय और करुणा के माध्यम से विश्व को दिशा दी है। साथ ही उन्होंने तेजी से बढ़ रहे धर्मांतरण को समाज के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि कुछ ईसाई और मुस्लिम मजहबी संस्थाओं द्वारा कथित रूप से चलाए जा रहे संगठित प्रयासों के प्रति समाज को सजग और संगठित रहने की आवश्यकता है।

“सतर्कता ही सुरक्षा है और संस्कार ही समाज की ढाल,” — यह संदेश उनके वक्तव्य की आत्मा रहा।


नारी शक्ति और आने वाली पीढ़ी पर फोकस

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुप्रसिद्ध मानस प्रवक्ता विजय लक्ष्मी शुक्ल ने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म के वास्तविक स्वरूप को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने मातृ शक्ति को आह्वान करते हुए कहा—

“माताएं ही ‘धर्म योद्धा’ गढ़ सकती हैं, जो संस्कार, संस्कृति और राष्ट्रबोध से ओतप्रोत हों।”

वहीं संत कृष्णानंद शास्त्री ने सनातन संस्कृति की रक्षा को प्रत्येक हिंदू का परम कर्तव्य बताते हुए समाज को आत्ममंथन और आत्मबल की राह पर चलने का संदेश दिया।


सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन

कार्यक्रम से पूर्व सरस्वती शिशु मंदिर, बड़हलगंज के छात्र–छात्राओं ने प्रधानाचार्य मनीष पाण्डेय के निर्देशन में मनोहारी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। देशभक्ति, संस्कार और परंपरा से जुड़ी इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया और पूरे परिसर में तालियों की गूंज सुनाई दी।


गणमान्य जनों की गरिमामयी उपस्थिति

कार्यक्रम का सफल संचालन वेदव्रत मिश्र ने किया, अध्यक्षता सुभाष जायसवाल ने की, जबकि अतिथियों का स्वागत ज्योतिरायण सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर चेयरमैन प्रतिनिधि महेश उमर, विभाग मंत्री डॉ. अश्वनी ओझा, विभाग प्रचारक अजय नारायण जी, विभाग कार्यवाह कौशलेंद्र जी, जिला प्रचारक दीपक जी, श्रीनिवास सोनी, तारकेश्वर वर्मा, व्यापार मंडल अध्यक्ष श्रीकांत सोनी, जनसेवा संस्था के महामंत्री संतोष जायसवाल, उमेश निगम, गंगा सोनी, राजेश पटवा, रामदेव वर्मा, सत्यम जायसवाल, राजुगुप्त, अमित पटवा, परमात्मा पटवा, संजय पटवा, शिवम वर्मा, यतींद्रनाथ त्रिपाठी, दुर्गेश निगम, दुर्गेश सोनी, प्रो. चिन्मय गुप्ता, दिलीप निगम, सभासद दीपक शर्मा, रचित उमर, सुरेश उमर, संजय कसेरा सहित बड़ी संख्या में समाजसेवी व बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।


चेतना, एकता और संकल्प का संदेश

लेटाघाट का यह हिंदू संगम केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सनातन चेतना के पुनर्जागरण का सशक्त संदेश बनकर उभरा। सरयू तट से उठी यह वैचारिक लहर समाज को अपनी जड़ों से जुड़ने, संस्कृति को समझने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुदृढ़ वैचारिक आधार तैयार करने का आह्वान करती नजर आई। यह आयोजन निश्चित ही समाज के बीच नई सोच, नई ऊर्जा और नई दिशा देने वाला साबित होगा—एक ऐसी दिशा, जहां सनातन संस्कृति केवल स्मृति नहीं, बल्कि जीवंत जीवन दर्शन बनकर आगे बढ़ेगी।